फिदायीन ऑपरेशन से दहशत में पाकिस्तान! बलूचिस्तान में BLA ने 36 घंटे में 130 लोगों को मौत के घाट उतारा

पाकिस्तान में में बलूच लिबरेशन आर्मी ने बताया कि फिदायीन ऑपरेशन हेरोफ' के तहत उन्होंने 36 घंटे में 130 दुश्मनों को मार गिराया. उनके लड़ाकों ने उन पाकिस्तानी सैन्य कर्मियों को निशाना बनाया जो नागरिक कपड़ों में यात्रा कर रहे थे.

पाकिस्तान में हाल ही में घटी एक चौंकाने वाली घटना में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने 26 अगस्त को हुए हमले की जिम्मेदारी ली है. BLA ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने 25 अगस्त से शुरू हुए 'फिदायीन ऑपरेशन हेरोफ' के तहत इस हमले को अंजाम दिया, जिसमें उन्होंने बलूचिस्तान में '130 दुश्मन कर्मियों' को मारने का दावा किया है. BLA का कहना है कि उनके लड़ाकों ने उन पाकिस्तानी सैन्य कर्मियों को निशाना बनाया जो नागरिक कपड़ों में यात्रा कर रहे थे.

हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन दावों को झूठा बताते हुए कहा है कि मारे गए लोग निर्दोष नागरिक थे. पाकिस्तान के राष्ट्रपति और गृह मंत्री ने इस हमले की निंदा की और इसे "बर्बर" करार दिया. यह हमला बलूचिस्तान में पहले भी हुए इसी प्रकार के हमलों की कड़ी में एक और घटना है, जिन्हें BLA ने अंजाम दिया था, जैसे कि अप्रैल और मई में हुए कई हत्याकांड.

इस हिंसा ने पाकिस्तान में हालात को और तनावपूर्ण बना दिया है और इससे संबंधित घटनाओं पर वैश्विक ध्यान भी बढ़ गया है. इस स्थिति ने बलूचिस्तान में स्थिरता की गंभीर चुनौतियों को उजागर किया है, जहां लंबे समय से स्वतंत्रता की मांग को लेकर संघर्ष जारी है.

बलूचिस्तान को आजाद करने की मांग क्यों हो रही है?

बलूचिस्तान को आज़ाद करने की मांग एक जटिल और पुरानी समस्या है, जो कई राजनीतिक, सामाजिक, और ऐतिहासिक कारकों से जुड़ी हुई है. बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और संसाधन-संपन्न प्रांत है, लेकिन यहां के लोगों का मानना है कि उन्हें पर्याप्त स्वायत्तता, अधिकार, और विकास से वंचित रखा गया है.

बलूचिस्तान की आज़ादी की मांग के पीछे प्रमुख कारण इस प्रकार हैं

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा है, जहां बलूच मेजोरिटी है. ये वे लोग हैं, जिनकी अपनी अलग बोली और कल्चर है. लंबे समय से बलूच पाकिस्तान से अलग अपने देश की मांग करते रहे. यानी कहा जाए तो ये एक तरह का अलगाववादी आंदोलन है, जो पाकिस्तान में फलते-फूलते कई चरमपंथी आंदोलनों में से एक है. अफगानिस्तान से सटे हुए इस प्रांत के लोगों का कहना है कि पाकिस्तान ने हमेशा उससे भेदभाव किया.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1947 में भारत के विभाजन के बाद, बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल कर लिया गया था. बलूचिस्तान के कुछ नेताओं और जनजातियों ने इस विलय का विरोध किया और इसे ज़बरदस्ती की कार्रवाई बताया. तब से ही बलूच स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा है.

संसाधनों का दोहन: बलूचिस्तान खनिज संसाधनों, प्राकृतिक गैस, और अन्य खनिजों से समृद्ध है, लेकिन वहां के लोगों का कहना है कि इन संसाधनों का दोहन किया जा रहा है और उन्हें इसका लाभ नहीं मिल रहा है. बलूच नेताओं का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार उनके संसाधनों का उपयोग कर रही है, लेकिन यहां के लोगों की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो रही हैं.

राजनीतिक अधिकारों की कमी: बलूचिस्तान के लोगों का मानना है कि उन्हें पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीति में सही प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. प्रांतीय स्वायत्तता और उनके अधिकारों की कमी को लेकर बलूच जनता में असंतोष है. उन्हें लगता है कि पाकिस्तान सरकार उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिश कर रही है.

सांस्कृतिक और जातीय पहचान: बलूचिस्तान की जनसंख्या मुख्य रूप से बलूच समुदाय से है, जो अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं के प्रति गर्व महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि पाकिस्तान सरकार उनकी सांस्कृतिक पहचान को खतरे में डाल रही है और उनकी विशिष्टता को नष्ट कर रही है.

मानवाधिकार हनन: बलूच स्वतंत्रता आंदोलन के चलते पाकिस्तान सरकार और सेना पर बलूच लोगों के साथ मानवाधिकारों के हनन के गंभीर आरोप लगे हैं. इनमें बलूच कार्यकर्ताओं और नेताओं का अपहरण, गुमशुदगी, और गैर-न्यायिक हत्याएं शामिल हैं. इन कारणों से बलूच जनता में आक्रोश और आज़ादी की मांग बढ़ी है.

बीएलए की आवाज सबसे ज्यादा सुनाई देती है. पहले वे शांति से अलगाव की मांग करते रहे. बीते कुछ दशकों से आंदोलन हिंसक हो चुका. पाकिस्तान सरकार ने बलूच इलाके में स्थिति खदानों को चीनियों को लीज पर दे रखा है. इसपर भड़के हुए बलूच मिलिटेंट बम धमाके भी करते रहते हैं.

बलूचिस्तान की आजादी की मांग एक जटिल मुद्दा है, जो पाकिस्तान के भीतर और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिणाम उत्पन्न कर सकता है. यह मुद्दा केवल बलूचिस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र में स्थिरता और शांति पर प्रभाव पड़ सकता है.

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