भारत के लिए खतरे की घंटी है मोंगला पोर्ट पर बांग्लादेश-चीन का समझौता!

बांग्लादेश के बंदरगाह मोंगला पोर्ट पर चीन के साथ समझौता भारत के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

बांग्लादेश के बंदरगाह मोंगला पोर्ट पर चीन के साथ समझौता भारत के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है. पहले यह समझौता भारत के साथ होना था. लेकिन अब इस समझौते से चीन को भारतीय सीमा के पास अपनी पकड़ जमाने में मदद मिलेगी.बांग्लादेश के दूसरे बड़े बंदरगाह मोंगला पोर्ट पर चीन के साथ समझौता भारत के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है. पहले यह समझौता भारत के साथ होना था. लेकिन अब इस समझौते से चीन को भारतीय सीमा के पास अपनी पकड़ जमाने में मदद मिलेगी.

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान बीते सप्ताह अपने पहले विदेश दौरे पर पहले मलेशिया और पिर चीन गए थे. अब तक बांग्लादेश में सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री पारंपरिक तौर पर पहले दौरे पर भारत आते रहे हैं. लेकिन पड़ोसियों से समान संबंध की हिमायत करने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अगुवाई वाली सरकार ने चीन का दौरा कर भारत को एक संदेश दिया है.

अपने चीन दौरे के आखिरी दिन रहमान ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक की. उस दौरान दोनों नेताओं के बीच आपसी महत्व के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई.

प्रधानमंत्री के सलाहकार मेहदी अमीन ने उस बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों को तारिक रहमान के चीन दौरे और बैठक के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया, "इस दौरान 11 सहमति पत्रों और चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं. इनमें मोंगला पोर्ट पर इकोनामिक जोन बनाने का समझैता भी शामिल है. चीन सड़क, पुल और रेलवे सेक्टर में 'मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्टेशन मैकेनिज्म' यानी बहुआयामी परिवहन प्रणाली तैयार करने में हमारी मदद करना चाहता है."

मोंगला पोर्ट का क्या महत्व है

भारत में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से कुछ दूर स्थित मोंगला पोर्ट की काफी अहमियत है. चीन वहां 110 एकड़ इलाके में एक इकोनॉमिक जोन और इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक हब बनाएगा. इसके अलावा वह इस बंदरगाह के आधुनिकीकरण और विस्तार की एक परियोजना पर भी काम करेगा. यह पोर्ट कोलकाता से करीब 188 किमी और भारत की जमीनी सीमा से महज 80 किमी दूर है.

इससे पहले वर्ष 2015 में भारत के साथ इस परियोजना के लिए बातचीत हुई थी. लेकिन वहां शेख हसीना की सरकार बदलने के बाद सत्ता संभालने वाली मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इस परियोजना से भारत का नाम हटा दिया था. विडंबना यह है कि खुलना को मोंगला पोर्ट से जोड़ने वाली रेलवे लाइन भारत की वित्तीय सहायता से ही बनाई गई थी. इसका मकसद दोनों देशों को आपसी व्यापार को बढ़ावा देना था. लेकिन अब यही लाइन चीन-संचालित इकोनॉमिक जोन को सेवा देगी.

भारत को किस बात की चिंता

मोंगला पोर्ट पर दोनों देशों के बीच हुए समझौते ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. इसकी वजह भारतीय सीमा से इसकी नजदीकी है. पोर्ट पर इकोनामिक जोन के निर्माण और संचालन की आड़ में इस इलाके में चीन की मौजूदगी मजबूत होगी. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मोंगला में इलेक्ट्रॉनिक्स सर्विलांस के जरिए चीन भारतीय नौसेना की गतिविधियों पर निगाह रख सकता है. साथ ही कोलकाता के अलावा हल्दिया बंदरगाह भी उसकी निगाह रहेगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि पहले यह जमीन भारत को सौंपी गई थी. उस समय इसे बांग्लादेश से लगे सीमावर्ती इलाकों में चीन की बढ़ती गतिविधियों के खिलाफ भारत की जीत के तौर पर देखा गया था. लेकिन मोहम्मद यूनुस सरकार के कार्यकाल में भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्तों में खाई बेहद बढ़ गई. इसी वजह से सरकार ने भारत से वह परियोजना वापस ले ली थी.

अमीन ने पत्रकारों को बताया कि चीन ने तीस्ता मास्टर प्लान के लिए तकनीकी सहायता देने और फिजिबिलिटी स्टडी करने में भी दिलचस्पी दिखाई है. विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा के लिहाज से तीस्ता के प्रबंधन पर दोनों देशों के बीच हुआ समझौता भी भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है. इसकी वजह यह है कि तीस्ता नदी भारत के उस इलाके से बहती है जिसे चिकन नेक कहा जाता है. यह सामरिक लिहाज से बेहद अहम है और पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है.

इस समझौते को इस इलाके में बांग्लादेश सरकार के एक बड़े नीतिगत बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. उस इलाके को भारत पारंपरिक रूप से अपने करीबी पड़ोस का हिस्सा मानता रहा है.

चीन का क्या कहना है

चीन बांग्लादेश के साथ हुए समझौतों को भू-राजनीतिक लिहाज से किसी तीसरे देश के लिए प्रतिकूल असर वाला नहीं मानता. दोनों देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान के मौके पर चीनी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने पत्रकारों के सवाल पर कहा, "चीन और बांग्लादेश के बीच सहयोग का मकसद किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाना नहीं है. इसे तीसरे पक्ष के असर से मुक्त होना चाहिए. चीन विभिन्न क्षेत्रों में बांग्लादेश के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है."

पश्चिम बंगाल के चिकन कारिडोर के नाम से मशहूर सिलीगुड़ी के एक सुरक्षा विशेषज्ञ देवब्रत सेनगुप्ता डीडब्ल्यू से कहते हैं, "तीस्ता परियोजना भी भारत के लिए चिंता की विषय है. यह नदी भारत-बांग्लादेश सीमा के नजदीक बहती है और देश के पूर्वोत्तर इलाके के लिए बेहद अहम है. दोनों देशों के बीच इसके पानी के बंटवारे पर दशकों पुराना विवाद रहा है."

भारत-बांग्लादेश संबंधों पर लंबे अरसे से निगाह रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बांग्लादेश में एक निर्वाचित सरकार के सत्ता संभालने के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में बेहतरी की उम्मीद पैदा हुई थी. लेकिन अब तारिक रहमान के चीन दौरे और इन समझौतों से साफ है कि बांग्लादेश अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए अब भारत की बजाय चीन को तरजीह दे रहा है. यह भारत के लिए चिंता का विषय है."

उनका कहना था कि मोंगला पोर्ट और तीस्ता मास्टर प्लान में चीन की भागीदारी से भारतीय सीमा के करीब उसकी उपस्थिति मजबूत होने की संभावना है.

विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी भी यही बात दोहराती हैं. वो डीडब्ल्यू से कहती हैं, "तारिक के बीते सप्ताह के चीन दौरे और दोनों देशों के बीच हुए समझौतों से भारत की चिंता बढ़नी स्वाभाविक है. जो मोंगला पोर्ट पहले भारत को मिलना था वो अब चीन को सौंप दिया गया है. इससे साफ है कि देश की आजादी के बाद सबसे करीबी पड़ोसी भारत के बारे में तारिक रहमान सरकार की नीतियों में बड़ा बदलाव हो रहा है. वो अब भारत को पहले जैसी अहमियत नहीं देना चाहती."

उनका कहना था कि भारत सरकार को ताजा घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए सतर्कता बरतनी होगी.

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