विज्ञान में अपमानजनक नामकरण पर बहस
वैज्ञानिकों के बीच इस बात पर बहस छिड़ी है कि जीवों या प्रजातियों को दिये गये अपमानजनक नामों को बदला जाना चाहिए या नहीं.
वैज्ञानिकों के बीच इस बात पर बहस छिड़ी है कि जीवों या प्रजातियों को दिये गये अपमानजनक नामों को बदला जाना चाहिए या नहीं. मसलन, हिटलर के नाम पर किसी जीव का नाम होना चाहिए या नहीं.क्या किसी जीव का नाम हिटलर के नाम पर रखा जा सकता है? आज कोई वैज्ञानिक अपनी किसी खोज का नाम हिटलर या मुसोलिनी के नाम पर रखने की बात शायद ही सोचे. लेकिन जब ये लोग सत्ता में थे और बेहद ताकतवर थे, तब ऐसे वैज्ञानिकों की कमी नहीं थी जो अपनी खोज का नाम इन नेताओं के नाम पर रख रहे थे. पर अब उन नामों को बदलने की मांग जोर पकड़ रही है.
1934 में एक जर्मनी जंतु-विज्ञानी ने एक उड़ने वाले विशाल कीट का नाम रोचलिंजिया हिटलरी रखा था. यह दो लोगों के नाम पर था. अडॉल्फ हिटलर, जो तब जर्मनी की सत्ता पर काबिज हुआ था और एक स्टील निर्माता हरमान रोएषलिंग जो स्थापित यहूदी विरोधी था.
1937 में ऑस्ट्रिया के एक शौकिया जीवविज्ञानी ने स्लोवेनिया की गुफाओं में एक झींगुर खोजा, जिसकी आंखें नहीं थीं. हिटलर के प्रशंसक उस वैज्ञानिक ने झींगुर की उस प्रजाति को नाम दिया एनोफथैलमस हिटलरी. हाल के सालों में ऐसी खबरें आई हैं कि उस झींगुर को खरीदने के लिए नियो-नात्सी लोग हजारों यूरो खर्च कर रहे हैं. इस कारण वह प्रजाति ही खतरे में पड़ गयी है.
जर्मनी और अन्य देशों में हाल के सालों में दक्षिणपंथी कट्टरता बढ़ी है लेकिन वैज्ञानिकों के बीच उन नामों को लेकर असहमतियां भी बढ़ी हैं और ऐसे नामों को बदलने की मांग तेज हुई है. कुछ वैज्ञानिक संगठनों ने इक्का-दुक्का नाम बदले भी हैं लेकिन इंटरनेशनल कमिशन ऑन जूओलॉजिकल नॉमनिक्लेचर (ICZN) ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था.
क्यों नहीं बदले जाते नाम
आईसीजेडएन नयी प्रजातियों के नाम रखने के काम की निगरानी करता है. इसी साल जनवरी में कमिशन ने कहा कि वह किसी प्रजाति का नाम बदलने पर विचार नहीं कर रहा है. कमिशन के प्रमुख लुइस सेरियाको खुद एक जीवविज्ञानी हैं और पोर्तो विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं. उन्होंने कहा, "अगर ये नाम स्थिर नहीं होंगे तो बहुत भारी कन्फ्यूजन पैदा हो जाएगा.”
इस बयान पर बहुत से वैज्ञानिकों ने आपत्ति भी जतायी. नेल्सन मंडेला यूनिवर्सिटी की रिया ओलिविएर हर्बारियम ने एक लेख में लिखा कि यह मामला अभूतपूर्व दुख देने वाले लोगों की याद से जुड़ा है. उन्होंने लिखा, "और कौन सा ऐसा क्षेत्र है जिसमें किसी चीज का नाम हिटलर के नाम पर रखा जाता है? समाज के बाकी तबकों की तरह यह व्यवहार बदला जाना चाहिए.”
कई बार प्रजातियों के नाम लोगों का मजाक उड़ाने के मकसद से भी रखे जाते हैं. जैसे 2017 में पीले सिर वाले और छोटे लिंग वाले एक कीट का नाम नियोपालपा डॉनल्डट्रंपी रख दिया गया.
चुनौती बहुत बड़ी है
पिछले दो साल में नामों को लेकर यह बहस काफी तेज हुई है. कई विज्ञान पत्रिकाओं में इस बारे में संपादकीय छपे हैं और कई वैज्ञानिकों ने नामों को लेकर पत्र भी लिखे हैं. इस बहस का हिस्सा कुछ मूल प्रजातियों के नाम भी हैं, जिन्हें विदेशियों के नामों पर पहचान मिली है.
मसलन, ऑस्ट्रेलिया में पाये जाने वाले एक फूल का नाम अंग्रेज जमींदार जॉर्ज हिबर्ट के नाम पर हिबर्शिया रखा गया है. वैज्ञानिक चाहते हैं कि इन प्रजातियों का नाम देश के मूल निवासियों की पहचान पर आधारित होना चाहिए.
कुछ वैज्ञानिक तो कहते हैं कि इंसानों के नामों पर प्रजातियों के नाम होने ही नहीं चाहिए. लेकिन इसके विपक्ष में तर्क यह दिया जाता है कि समाजिक सांस्कृतिक बदलावों से वैज्ञानिक नाम प्रभावित नहीं होने चाहिए.
2022 में एंटोमोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका ने एक पतंगे का नाम जिप्सी से बदलकर लाइमेंटरिया कर दिया था क्योंकि जिप्सी लोगों के लिए उस नाम को अपमानजनक माना गया था.
लेकिन नाम बदलने की यह चुनौती छोटी नहीं है. धरती पर करीब 15 लाख प्रजातियां हैं जिनमें से 20 फीसदी के नाम किसी ना किसी इंसान पर और करीब 10 फीसदी के नाम स्थानों पर आधारित हैं. नाम बदलने का अर्थ होगा कि लाखों जीवों और प्रजातियों के नाम बदलने होंगे.
विवेक कुमार (एएफपी)
(The above story first appeared on LatestLY on Sep 06, 2023 01:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

