कौन हैं भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत?
Bhakti Movement

आइये जानें भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों कबीरदास, रविदास, मीरा बाई, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य, जगद्गुरु श्री कृपालु महाराज, संत नामदेव आदि — के योगदान और उनकी शिक्षाओं के बारे में. भारत के मध्यकालीन इतिहास में भक्ति आंदोलन एक ऐसी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक लहर के रूप में उभरा जिसने धर्म, समाज और साहित्य में गहरे बदलाव लाए. यह आंदोलन 7वीं शताब्दी में दक्षिण भारत से प्रारंभ हुआ और 15वीं से 17वीं शताब्दी के बीच चरम पर पहुँच गया.

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भक्ति आंदोलन के सिद्धांत

भक्ति आंदोलन ने बाहरी कर्मकांडों, जातिगत भेदभाव और पुरोहितवाद की सत्ता को चुनौती दी. इसकी मूल भावना थी कि हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो, ईश्वर से सीधे जुड़ सकता है. इस आंदोलन की एक और खासियत थी क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग. संतों ने अपनी वाणी में हिंदी, तमिल, कन्नड़, अवधी, ब्रज, मराठी, उड़िया, बंगाली जैसी स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया, जिससे आम लोगों तक उनका संदेश आसानी से पहुंच सका.

भक्ति के आंतरिक और भावनात्मक स्वरूप पर ज़ोर दिया गया एवं प्रेम, करुणा और दीनता जैसे गुणों को प्रमुखता दी गई. लोक धुनों और सरल उपमाओं से भरे इन संतों के भजन और पद आज भी जनमानस में जीवित हैं.

प्रमुख संत और उनके योगदान

भक्ति आंदोलन के दौरान अनेक संतों ने अपने विचारों, काव्य और जीवन के माध्यम से समाज को नई दिशा दी. नीचे दिए गए संतों का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा:

  • जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य: इन्होंने विशिष्टाद्वैत दर्शन की स्थापना की और शूद्रों तथा अछूतों को भी भक्ति में शामिल किया. ये भक्ति को जीव कल्याण का सर्वोत्तम साधन मानते थे.
  • जगद्गुरु श्री निंबार्काचार्य: इन्होंने द्वैताद्वैत दर्शन दिया और राधा-कृष्ण की उपासना को प्रमुख बनाया. इन्होंने ज्ञान और भक्ति का संतुलन साधा. निंबार्काचार्य के अनुसार, श्री कृष्ण ब्रह्म हैं और राधा रानी के साथ उनकी उपासना की जाती है. उनका दर्शन 'स्वाभाविक द्वैताद्वैत' या 'स्वाभाविक भेदाभेद' के रूप में भी जाना जाता है.
  • जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य: द्वैत दर्शन के प्रबल समर्थक, जिन्होंने आत्मा और परमात्मा को सदा भिन्न माना और विष्णु-भक्ति को कल्याण का उपाय बताया.
  • जगद्गुरु श्री कृपालु महाराज: आधुनिक काल के भक्ति आचार्य, जिन्होंने राधा-कृष्ण भक्ति को एक नई ऊँचाई दी. इन्होंने संकीर्तन के समय रूपध्यान मेडिटेशन साधना पर ज़ोर दिया. कृपालु जी ने प्रेम मंदिर (वृंदावन), भक्ति मंदिर (प्रतापगढ़) और कीर्ति मंदिर (बरसाना) की स्थापना की और प्रेम रस सिद्धांत, प्रेम रस मदिरा, ब्रज रस माधुरी जैसे भक्ति के ग्रन्थ लिखे.
  • वल्लभाचार्य: शुद्धाद्वैत दर्शन के प्रवर्तक, इन्होंने श्री कृष्ण की बाल रूप में पूजा और प्रेमपूर्ण भक्ति को सर्वोपरि बताया.
  • चैतन्य महाप्रभु: इन्होंने संकीर्तन (सामूहिक भजन) की परंपरा को लोकप्रिय बनाया. उनकी भक्ति भावविभोर और उल्लासपूर्ण थी. इनका मानना था कि भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम ही जीवन का परम लक्ष्य है और इसे प्राप्त करने के लिए भक्ति ही एकमात्र साधन है.
  • संत कबीरदास: जुलाहा परिवार में जन्मे कबीर ने धार्मिक पाखंड, मूर्तिपूजा और जातिवाद का विरोध किया. उन्होंने आत्मा और परमात्मा के सीधे संबंध पर बल दिया.
  • गुरु नानक: सिख धर्म के संस्थापक, जिन्होंने एक ईश्वर, समानता और सच्चाई की बात की. उनका धर्म हर जाति और पंथ के लिए खुला था.
  • मीरा बाई: श्री कृष्ण की प्रेमभक्त कवियित्री, जिन्होंने समाज की रूढ़ियों को त्याग कर भक्ति को जीवन का उद्देश्य बना लिया. इनके भजन आज भी जन-जन में गूंजते हैं.
  • संत तुलसीदास: इन्होंने रामचरितमानस की रचना कर भगवान राम को जन-जन तक पहुँचाया. ये रामभक्ति के अद्भुत कवि थे. अवधी भाषा में लिखी उनकी रचनाओं ने केवल धार्मिक चेतना ही नहीं जगाई, बल्कि समाज की सोच को भी गहराई से बदला.
  • संत सूरदास: कृष्ण की लीलाओं के गायक, सूरदास ने बालकृष्ण की छवियों के माध्यम से प्रेम और समर्पण का संदेश दिया.
  • संत रविदास: इन्होंने जाति-पांति, छुआछूत का विरोध करते हुए कहा कि आत्मा में कण-कण में ईश्वर वास करते हैं. गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 40 भजन शामिल हैं, जो उनके विचारों की सार्वभौमिकता को दर्शाते हैं.
  • संत नामदेव: वारकरी संप्रदाय में अग्रणी, महाराष्ट्र और उत्तर भारत में व्यक्तिगत कृष्ण भक्ति की संस्कृति को पुष्ट किया. उन्होंने निरगुण और सगुण दोनों रूपों में भगवद्भक्ति का समर्थन किया.
  • संत एकनाथ: मराठी भाषी वारकरी आंदोलन का नेतृत्व कर भक्ति गीतों और भक्ति प्रवचन के माध्यम से साधारण जीवन में आध्यात्मिकता का संदेश दिया.
  • संत तुकाराम: मराठी अभंग काव्य के माध्यम से लोकभक्ति को उजागर किया. उनकी रचनाएँ आज भी महाराष्ट्र में भजन मंडलों में गाई जाती हैं.
  • समर्थ रामदास: 17वीं सदी में मराठी क्षेत्र में श्री राम और हनुमान भक्ति को लोकप्रिय बनाया. छत्रपति शिवाजी के आद्य गुरु और मार्गदर्शक रहे. इन्होंने भक्ति और योग का एकीकृत आदर्श प्रस्तुत किया, जिसमें सेवा, नैतिकता और वीरता का संतुलन था.
  • मलूकदास: उत्तर प्रदेश के संत, जिन्होंने ईश्वर की एकता और आंतरिक पवित्रता पर जोर दिया. वे धर्म के नाम पर हो रहे पाखंड के आलोचक थे.