Krishna Janmashtami 2026: कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है? जानें डेट, शुभ मुहूर्त, निशीथ काल पूजा का समय, पूजा विधि और महत्व

महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई में जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का आयोजन किया जाता है, जिसमें गोविंदा दल मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी मटकी फोड़ते हैं. गुजरात के द्वारका में विशेष जन्मोत्सव पूजा होती है, जबकि दक्षिण भारत में भक्ति गीत, कृष्ण स्नान और रंगोली (कोलम) की परंपरा प्रमुख रहती है.

Krishna Janmashtami 2026 Date, Puja Muhurat, Nishita Kaal Timings and Significance: भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami) हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और प्रमुख त्योहारों में से एक है. यह पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है. हिंदू पंचांग के अनुसार यह त्योहार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जाएगी. इस दिन देशभर के मंदिरों और घरों में भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और मध्यरात्रि में जन्मोत्सव का आयोजन किया जाएगा. यह भी पढ़ें: Janmashtami 2025: श्री कृष्णजन्माष्टमी महोत्सवस्य शुभकामनाः! शेयर करें ये संस्कृत Wishes, Shlokas, Messages, Greetings

कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में अत्याचारी राजा कंस का अंत करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था. श्रीकृष्ण के जन्म का समय मध्यरात्रि माना जाता है, इसलिए जन्माष्टमी पर निशीथ काल में पूजा का विशेष महत्व होता है. इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं और उनके जीवन से जुड़े प्रेम, भक्ति, धर्म और कर्म के संदेशों को आत्मसात करने का संकल्प लेते हैं.

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त (Krishna Janmashtami 2026 Shubh Muhurat)

जन्माष्टमी की तिथि: शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

अष्टमी तिथि प्रारंभ: 4 सितंबर 2026, सुबह 2:25 बजे

अष्टमी तिथि समाप्त: 5 सितंबर 2026, रात 12:13 बजे

रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 4 सितंबर 2026, रात 12:29 बजे

रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 4 सितंबर 2026, रात 11:04 बजे

कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि (Krishna Janmashtami Puja Vidhi)

जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं. घर के मंदिर या पूजा स्थल की साफ-सफाई कर उसे फूलों, रंगोली और दीपों से सजाया जाता है. इसके बाद बाल गोपाल (लड्डू गोपाल) की प्रतिमा को सुंदर पालने में स्थापित किया जाता है.

मध्यरात्रि के निशीथ काल में भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से अभिषेक किया जाता है. इसके बाद उन्हें नए वस्त्र, आभूषण और मोरपंख पहनाकर श्रृंगार किया जाता है. भगवान को माखन-मिश्री, पंजीरी, खीर, फल और अन्य प्रिय भोग अर्पित किए जाते हैं. अंत में आरती, भजन-कीर्तन और मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न होती है. अधिकांश श्रद्धालु अगले दिन सूर्योदय के बाद या मध्यरात्रि आरती के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करते हैं.

प्रमुख शहरों में निशीथ काल पूजा का समय (Nishita Kaal Puja Timings)

नई दिल्ली: रात 11:57 बजे (4 सितंबर) से 12:43 बजे (5 सितंबर), मध्यरात्रि 12:20 बजे

मुंबई: रात 12:14 बजे से 1:01 बजे (5 सितंबर), मध्यरात्रि 12:37 बजे

कोलकाता: रात 11:13 बजे से 11:59 बजे (4 सितंबर), मध्यरात्रि 11:36 बजे

देशभर में कैसे मनाई जाती है कृष्ण जन्माष्टमी?

उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी का उत्सव सबसे भव्य रूप में मनाया जाता है. यहां मंदिरों को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साथ विशेष दर्शन और रासलीला का आयोजन होता है.

महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई में जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का आयोजन किया जाता है, जिसमें गोविंदा दल मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी मटकी फोड़ते हैं. गुजरात के द्वारका में विशेष जन्मोत्सव पूजा होती है, जबकि दक्षिण भारत में भक्ति गीत, कृष्ण स्नान और रंगोली (कोलम) की परंपरा प्रमुख रहती है. पश्चिम बंगाल में भी भजन-कीर्तन और मध्यरात्रि पूजा के साथ यह पर्व श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है.

कृष्ण जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति, सत्य, धर्म और मानवता का संदेश देने वाला उत्सव भी है. यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को जीवन में अपनाने और समाज में सद्भाव, शांति एवं खुशहाली का संदेश देता है.

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