Ashadhi Ekadashi 2026 Messages: आषाढ़ी एकादशी के इन हिंदी Quotes, WhatsApp Wishes, Facebook Greeting के जरिए दें शुभकामनाएं
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाने वाली आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी एकादशी) इस वर्ष 25 जुलाई 2026 को मनाई जा रही है. इस दिन से भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा में चले जाते हैं और महाराष्ट्र की प्रसिद्ध 700 साल पुरानी पंढरपुर वारी यात्रा का समापन होता है.
Ashadhi Ekadashi 2026 Messages In Hindi: हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखने वाली आषाढ़ी एकादशी (जिसे देवशयनी एकादशी, हरिशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी भी कहा जाता है) वर्ष 2026 में शनिवार, 25 जुलाई को श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाई जा रही है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन तिथि से भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योग निद्रा में चले जाते हैं. इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है, जिस दौरान विवाह और मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है.
हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई 2026 को सुबह 9:13 बजे से हो रही है और इसका समापन 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 बजे होगा. ऐसे में उदयातिथि के नियम का पालन करते हुए व्रत और मुख्य पूजा-अर्चना 25 जुलाई को ही की जाएगी.
पंढरपुर वारी यात्रा का भावुक क्षण
महाराष्ट्र में आषाढ़ी एकादशी का पर्व अत्यंत महत्व रखता है. यह दिन 700 से अधिक वर्षों से चली आ रही 'पंढरपुर वारी यात्रा' के आधिकारिक समापन का प्रतीक है. देहू से संत तुकाराम महाराज की पालकी और आलंदी से संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी समेत विभिन्न संतों की दिंडियां (पदयात्राएं) सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा तय करके 24-25 जुलाई को सोलापुर जिले के पंढरपुर पहुंचेंगी.
लाखों वारकरी (तीर्थयात्री) "ज्ञानबा तुकाराम" और "विट्ठल विट्ठल जय हरि विट्ठल" के भजनों के साथ चंद्रभागा नदी में स्नान कर भगवान विट्ठल (श्रीहरि का रूप) और माता रुक्मिणी के दर्शन करेंगे.
आषाढ़ी एकादशी का धार्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ी एकादशी का व्रत रखने से साधक को वर्ष की सभी 24 एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है और समस्त पापों का नाश होता है. इस दिन भक्त सूर्योदय से पहले स्नान कर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करते हैं, तुलसी पत्र अर्पित करते हैं और पूरे दिन उपवास रखते हैं.
आषाढ़ी एकादशी न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह महाराष्ट्र की समृद्ध आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है, जहाँ जाति-पाति के भेदभाव से ऊपर उठकर भक्ति का माहौल देखने को मिलता है.