Ashadha Gupt Navratri 2026: आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की 15 जुलाई से शुरुआत, 12 साल बाद बन रहा है दुर्लभ संयोग; जानें कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और नियम
साल 2026 में आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि 15 जुलाई से शुरू होने जा रही है, जिसका समापन 23 जुलाई को व्रत पारण के साथ होगा. 12 साल बाद बन रहे दुर्लभ शुभ संयोगों के बीच इस बार नौ दिनों तक दस महाविद्याओं और मां शक्ति की विशेष मानसिक व तांत्रिक साधना की जाएगी. इस पावन अवसर पर अपनों को बधाई देने के लिए विशेष संदेश भी साझा किए गए हैं.
नई दिल्ली: शक्ति, अध्यात्म और गुप्त साधना का नौ दिवसीय महापर्व 'आषाढ़ गुप्त नवरात्रि' (Ashadha Gupt Navratri) इस साल 15 जुलाई 2026 (बुधवार) से शुरू होने जा रहा है. सनातन परंपरा में वर्ष भर में चार बार नवरात्रि का आयोजन होता है, जिनमें चैत्र और शारदीय नवरात्रि को सामाजिक रूप से बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जबकि माघ और आषाढ़ मास में आने वाली नवरात्रि को 'गुप्त नवरात्रि' कहा जाता है. आषाढ़ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होने वाले इस अनुष्ठान का समापन 23 जुलाई 2026 (गुरुवार) को व्रत पारण के साथ होगा. ज्योतिषविदों के अनुसार, इस साल की गुप्त नवरात्रि बेहद खास है क्योंकि पूरे 12 साल बाद इस अवधि में कई दुर्लभ और बेहद शुभ संयोगों का निर्माण हो रहा है, जो साधकों को उनकी पूजा का कई गुना अधिक फल प्रदान करेंगे. यह भी पढ़ें: Nirjala Ekadashi 2026 Date: निर्जला एकादशी कब है? जानें व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और भीमसेनी एकादशी का धार्मिक महत्व
घटस्थापना (कलश स्थापना) का सबसे सटीक शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 14 जुलाई 2026 को दोपहर 03 बजकर 12 मिनट पर होगी और इसका समापन अगले दिन 15 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर होगा. उदयातिथि की मान्यता के अनुसार, नवरात्रि का प्रारंभ 15 जुलाई से माना जाएगा.
इस बार घटस्थापना के लिए दो विशेष शुभ मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे:
- प्रातःकालीन मुहूर्त: 15 जुलाई को सुबह 05 बजकर 33 मिनट से सुबह 10 बजकर 09 मिनट तक (कुल अवधि: 4 घंटे 36 मिनट).
- अभिजीत मुहूर्त: इस दिन कोई भी विशिष्ट अभिजीत मुहूर्त उपलब्ध नहीं होने के कारण, सुबह के समय ही कलश स्थापना करना सबसे उत्तम रहेगा. साधक स्थानीय पंचांग के अनुसार मामूली समय परिवर्तन की जांच कर सकते हैं.
12 साल बाद बना दुर्लभ संयोग और दस महाविद्याओं की साधना
इस वर्ष आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के दौरान बुद्ध-पुष्य योग और गजकेसरी योग जैसे अत्यंत फलदायी ज्योतिषीय संयोग बन रहे हैं, जो लगभग 12 वर्षों के बाद इस अवधि में एक साथ आए हैं. गुप्त नवरात्रि का मुख्य उद्देश्य तंत्र-मंत्र, सिद्धियों की प्राप्ति और आत्मिक शुद्धिकरण से जुड़ा होता है. शाक्त ग्रंथों जैसे मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) और देवी भागवत महापुराण में इसका विशेष वर्णन मिलता है.
इस नौ दिवसीय अनुष्ठान के दौरान अघोरी, तांत्रिक और विशिष्ट साधक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ-साथ अत्यंत शक्तिशाली 'दस महाविद्याओं' की गुप्त रूप से साधना करते हैं। इन दस देवियों में शामिल हैं: मां काली, मां तारा, मां छिन्नमस्ता, मां षोडशी, मां भुवनेश्वरी, मां त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, मां बगलामुखी, मां मातंगी और मां कमला.
सामान्य गृहस्थों के लिए सरल पूजा विधि और कड़े नियम
यद्यपि यह पर्व तांत्रिक क्रियाओं के लिए प्रसिद्ध है, परंतु सामान्य गृहस्थ भी इस दौरान मानसिक पूजा के माध्यम से मां भगवती का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं. गृहस्थों को सलाह दी जाती है कि वे इन नौ दिनों में तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) का पूरी तरह त्याग करें और ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करें. सुबह-शाम शुद्ध घी का दीपक जलाकर 'दुर्गा चालीसा' या 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ करना बेहद कल्याणकारी माना जाता है. इस नवरात्रि में की गई पूजा को 'गुप्त' रखने का विधान है, अर्थात अपनी साधना और मन्नत की चर्चा किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं करनी चाहिए.