सीबीएसई का ओएसएम सिस्टम आखिर क्यों फेल हो गया?

सीबीएसई ने बारहवीं कक्षा की परीक्षा में मूल्यांकन के लिए ओएसएम सिस्टम लागू किया लेकिन इस सिस्टम में इतनी खामियां मिलीं कि अब सीधे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सीबीएसई ने बारहवीं कक्षा की परीक्षा में मूल्यांकन के लिए ओएसएम सिस्टम लागू किया लेकिन इस सिस्टम में इतनी खामियां मिलीं कि अब सीधे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है.केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई ने बारहवीं की बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन के लिए 2026 में ऑनस्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) तरीका अपनाया जिसकी काफी चर्चा हुई लेकिन बोर्ड परीक्षा के परिणाम के बाद ओएसएम की परीक्षा का भी परिणाम दिख गया. बोर्ड की परीक्षा में तो पिछली बार की तुलना में काफी ज्यादा बच्चे फेल हो गए लेकिन बोर्ड परीक्षा में शामिल छात्रों के लिहाज से देखें तो मूल्यांकन की ओएसएम प्रणाली तो लगभग पूरी तरह से फेल साबित हुई.

ओएसएम यानी ऑनस्क्रीन मार्किंग सिस्टम, डिजिटल मूल्यांकन की एक प्रक्रिया है जिसे सीबीएसई ने बारहवीं बोर्ड की परीक्षा में उत्तर पुस्तिकाओं (कॉपियों) की जांच के लिए इस्तेमाल किया था. इसके तहत पहले सभी कॉपियों को स्कैन किया गया यानी उनकी डिजिटल तस्वीर खींची गई, फिर इन तस्वीरों को ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड कर दिया गया. उसके बाद परीक्षकों ने इन्हीं अपलोड तस्वीरों (जो छात्रों की उत्तर पुस्तिका की तस्वीरें थीं) को कंप्यूटर की स्क्रीन पर देखकर नंबर दिया.

बोर्ड को लगा कि यह ऑनलाइन तरीका ज्यादा स्पष्ट और पारदर्शी होगा, समय की भी बचत होगी और ऊर्जा की भी. क्योंकि अभी तक तो कॉपियां जांचने का यही तरीका रहा है कि परीक्षा के बाद कॉपियों को इकट्ठा कर अध्यापकों के पास भेज दिया जाता था. संबंधित विषयों के अध्यापक उन कॉपियों के एक-एक पेज को पढ़ते थे और वहीं उनके नंबर चढ़ाते थे.

बोर्ड का दावा है कि उसने इस प्रक्रिया के लिए बड़े स्तर पर तैयारी की थी और सभी तरह की खामियों को दुरुस्त करने के बाद ही इसे अमल में लाया गया लेकिन विवाद शुरू होने से लेकर अब तक जिस तरह के और जितनी ज्यादा संख्या में मामले सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए बोर्ड के दावे पर कई सवाल उठ रहे हैं.

विरोध प्रदर्शन और इस्तीफे की मांग

सिस्टम पर विवाद शुरू होने के बाद पहले तो बोर्ड और सरकार ने गलती मानी ही नहीं, विवाद को निराधार बताते रहे, सवाल उठाने वालों पर ही सवाल उठने लगे लेकिन जब खामियों से संबंधित तमाम चीजें स्पष्ट रूप से सामने आने लगीं तो खुद शिक्षा मंत्री ने माना कि ‘हां, गलतियां हुई हैं.'

सीबीएसई ने भी तकनीकी खामियों की बात स्वीकार करते हुए किसी भी संभावित समस्या की जांच एक्सपर्ट से कराने की बात कही. इस बीच, 18 लाख से ज्यादा परीक्षार्थियों में से चार लाख से ज्यादा ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन्ड कॉपी की मांग कर डाली. उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन के लिए बोर्ड ने अपने पोर्टल को एक जून से दोबारा सक्रिय किया लेकिन पोर्टल खुले ही नहीं. तमाम शिकायतें उसके बाद भी आती रहीं.

विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सीबीएसई के चेयरमैन और सचिव का ट्रांसफर तो कर दिया, लेकिन विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी की छात्र और युवा इकाई इस पूरे मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है. देश के अलग-अलग शहरों में लगातार विरोध प्रदर्शन और कैंडल मार्च हो रहे हैं और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है.

इस बीच, सीबीएसई ने बारहवीं कक्षा की कापियों और पुनर्मूल्यांकन से जुड़े डाटा को हैदराबाद स्थित कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड नाम की उस विवादित निजी कंपनी के सर्वर से हटाकर अपने सर्वरों पर ट्रांसफर कर दिया है जिस कंपनी पर सवाल उठ रहे हैं. लेकिन तकनीकी खामियों के बावजूद बोर्ड ने पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया में कापियों की स्कैनिंग का काम अभी भी इसी कंपनी के पास रखा हुआ है.

सीबीएसई की ओएसएम मूल्यांकन प्रणाली और उसके लिए जिस कंपनी को टेंडर दिया गया, उस प्रक्रिया में तमाम खामियों का पर्दाफाश किया. उन्होंने इस बारे में शिक्षा मामलों की संसदीय समिति के सामने प्रेजेंटेशन दिया और बताया कि किस तरह सीबीएसई ने टेंडर नियमों में बार-बार बदलाव करके एक विवादित कंपनी को ऑनलाइन कॉपियां जांचने का ठेका दिया. यही नहीं, ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं.

कहां हो गई गलती?

दिल्ली में सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध एक स्कूल की टीचर सुषमा धर कहती हैं कि गलतियां ऑफलाइन मूल्यांकन में भी होती थीं लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नहीं होती थीं. डीडब्ल्यू से बातचीत में सुषमा धर कहती हैं, "चूंकि परीक्षा ऑफलाइन हो रही है और मूल्यांकन ऑनलाइन हो रहा है, तो ऐसे में मूल्यांकन करने वाले परीक्षकों को भी पर्याप्त ट्रेनिंग दी जानी चाहिए थी. पर ऐसा नहीं हुआ. कामचलाऊ प्रशिक्षण के बाद ही इस प्रणाली को इतने बड़े पैमाने पर लागू कर दिया गया. शायद बोर्ड ये मानकर चल रहा था कि टीचर इतना तो जानते ही होंगे.”

वहीं नोएडा में सीबीएसई बोर्ड से ही संबद्ध एक स्कूल के शिक्षक शीलेश शेखर कहते हैं कि बेहतर यह होता कि कुछ समय तक मूल्यांकन की दोनों पद्धतियों यानी ऑनलाइन और ऑफलाइन को एक साथ चलाया जाता और छात्रों को दोनों में से एक विकल्प को चुनने की छूट दी जाती. उनके मुताबिक, "जब यह तरीका सबकी समझ में आ जाता, उसके बाद ऑनलाइन पर आया जा सकता था.”

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इसके अलावा, जिस कोएम्प्ट एडुटेक कंपनी को मूल्यांकन का ठेका दिया गया है, उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं और उसकी कार्यशैली भी विवादों के घेरे में है. सीबीएसई बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि इस प्रक्रिया में सिर्फ बड़े स्तर के अधिकारी और मंत्रालय के लोग शामिल होते हैं लेकिन गड़बड़ी होने पर जिम्मेदारी निचले अधिकारियों पर थोप दी जाती है.

उनके मुताबिक, "बड़ी संख्या में शिकायतें आ रही हैं कि कॉपी धुंधली है, हैंडराइटिंग नहीं मिल रही है, किसी की कॉपी पर किसी दूसरे का नंबर चढ़ा दिया गया है. आखिर, इन सबके लिए तो वह एजेंसी या कंपनी ही जिम्मेदार है लेकिन अब तक किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है. अभी ऑफलाइन में ऐसी एक भी शिकायत आई होती तो कॉपी जांचने वाला टीचर या एक्सपर्ट तुरंत नाप दिया जाता.”

क्या हैं प्रमुख चुनौतियां?

यही नहीं, चुनौतियां और भी हैं. इन स्कैन्ड कॉपियों को किस तरह जांचा गया है और कैसे नंबर दिया गया है, उस पर भी सवाल हैं. कई छात्रों की शिकायतें हैं कि बहुविकल्पीय सवालों पर भी आधे-आधे नंबर काट लिए गए हैं. अब यदि छात्र इनके पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करें तो हर सवाल के हिसाब से 25 रुपये देने होंगे. पहले यह फीस प्रति सवाल 100 रुपये थी.

हालांकि सीबीएसई ने बड़े जोर-शोर से दावा किया था कि ओएसएम सिस्टम आने के बाद शिक्षकों को सिर्फ कंटेंट पर ध्यान देना होगा, नंबरों को जोड़ने का काम सिस्टम (कंप्यूटर) खुद कर लेगा. लेकिन अब यह दावा पूरी तरह से गलत साबित होता दिख रहा है. कई छात्रों की कॉपियों के अंदर के पन्नों पर जो नंबर दिए गए हैं, डिजिटल शीट पर मिले कुल नंबरों में फर्क आ रहा है. कई कॉपियों की स्कैनिंग ऐसी की गई है कि वो समझ में ही नहीं आ रहे हैं. ऐसे में सवाल ये है कि परीक्षक ने क्या पढ़कर नंबर दिया होगा.

शिक्षा मंत्रालय ने इन खामियों पर एक बयान जारी कर बताया है कि इन्हें सुधारने के लिए आईआईटी कानपुर और आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों की टीम को सीबीएसई की मदद के लिए भेजा गया है.

वहीं, पूरे सिस्टम की साइबर सुरक्षा को लेकर भी खतरे मौजूद हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक न सिर्फ सिस्टम का मास्टर पासवर्ड क्रैक किया जा सकता है बल्कि इनके जरिए परीक्षा की कॉपियों और कॉपियों का मूल्यांकन करने वाले विशेषज्ञों के अकाउंट तक भी पहुंचा जा सकता है. यही नहीं, छात्रों की निजी जानकारी तक भी हासिल किया जा सकता है. कुछ विशेषज्ञों ने ऐसा करने का दावा भी किया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ओएसएम सिस्टम को प्रभावी और विश्वसनीय बनाना है तो सबसे पहले इसे पूरी तरह लागू करने से पहले व्यापक स्तर पर परीक्षण करके ही लागू किया जाना चाहिए ताकि तकनीकी खामियों का पता लगाया जा सके और उन्हें दूर करने के उपाय ढूंढ़े जा सकें.

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