HB Karibasamma: कौन हैं एचबी करिबसम्मा? इच्छामृत्यु के लिए 24 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाली बुजुर्ग शिक्षिका ने 'भारत के वीर' फंड में दान किए 10 लाख रुपये

देश में गरिमापूर्ण मृत्यु (राइट टू डाई) के अधिकार के लिए दो दशकों से अधिक समय तक कानूनी संघर्ष करने वाली 86 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षिका एचबी करिबसम्मा ने अपनी जीवनभर की पूंजी से 'भारत के वीर' फंड में 10 लाख रुपये का बड़ा दान दिया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर Image Credit: Twitter/BPD Balance @JadeBPDcoach

दावणगेरे (कर्नाटक): भारत में पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए 24 वर्षों तक लंबी कानूनी और सामाजिक जंग लड़ने वाली वयोवृद्ध कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षिका एचबी करिबसम्मा ने एक बार फिर समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की है. एडवांस्ड ओवेरियन कैंसर (अंडाशय का कैंसर) और रीढ़ की गंभीर बीमारियों से जूझ रहीं 86 वर्षीय करिबसम्मा ने देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों के कल्याण के लिए 'भारत के वीर' (Bharat Ke Veer) फंड में 10 लाख रुपये का योगदान दिया है. उन्होंने अपनी व्यक्तिगत बचत से यह राशि दावणगेरे के उपायुक्त (Deputy Commissioner) जी एम गंगाधरैया को एक चेक के माध्यम से सौंपी. यह भी पढ़ें: Harish Rana Passes Away: पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) की कानूनी अनुमति पाने वाले देश के पहले मरीज हरीश राणा का AIIMS में निधन

वृद्धाश्रम में रहकर जुटाई पाई-पाई, देश के नाम की समर्पित

करिबसम्मा वर्तमान में अपने पति के साथ स्थानीय वृद्धाश्रम में रह रही हैं. उन्होंने यह 10 लाख रुपये की बड़ी राशि अपनी सरकारी शिक्षक की पेंशन और अपनी व्यक्तिगत आवासीय संपत्ति को बेचकर जमा की थी. खुद कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित होने और चिकित्सा खर्च लगातार बढ़ने के बावजूद, उन्होंने अपनी बची हुई सारी संपत्ति को देश की रक्षा में तैनात जवानों के परिवारों की मदद के लिए सौंपने का फैसला किया.

केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आने वाला 'भारत के वीर' एक ऐसा ट्रस्ट है, जो ड्यूटी के दौरान सर्वोच्च बलिदान देने वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के जवानों के परिवारों को सीधे वित्तीय सहायता प्रदान करता है.

कौन हैं एचबी करिबसम्मा और क्यों शुरू की मुहिम?

कर्नाटक की रहने वाली एचबी करिबसम्मा को भारत में 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' (Right to Die with Dignity) की वकालत करने वाले एक प्रमुख चेहरे के रूप में जाना जाता है. उनका यह संघर्ष 1990 के दशक के उत्तरार्ध में तब शुरू हुआ, जब स्लिप्ड डिस्क की एक गंभीर समस्या के कारण वे पूरी तरह बिस्तर पर आ गईं और असहनीय क्रॉनिक पेन (लगातार होने वाले गंभीर दर्द) का शिकार हो गईं.

उस समय देश के कानूनी ढांचे में इच्छामृत्यु को अपराध माना जाता था। इसके खिलाफ आवाज उठाते हुए करिबसम्मा ने 1998 में कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की. इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट, कई राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों को भी दया याचिकाएं भेजीं. साल 2010 में, उन्होंने गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित मरीजों को सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार देने की नीति पर चर्चा के लिए 10,000 से अधिक नागरिकों के हस्ताक्षर जुटाकर सरकार पर दबाव बनाया था। इस मुहिम के लिए उन्होंने अपनी संपत्ति बेच दी और अपने परिवार से भी अलग हो गईं ताकि कानूनी खर्चों के लिए किसी से चंदा न लेना पड़े.

कानूनी सफलता और निरंतर पैरवी

करिबसम्मा के दशकों लंबे संघर्ष को एक बड़ी प्रशासनिक सफलता तब मिली, जब कर्नाटक राज्य स्वास्थ्य विभाग ने पैसिव इच्छामृत्यु के दिशा-निर्देशों को लागू करने के लिए एक आधिकारिक परिपत्र जारी किया. इस निर्देश के तहत सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार, उन लाइलाज और चेतना खो चुके मरीजों के लाइफ सपोर्ट को हटाने का फैसला करने के लिए आवश्यक मेडिकल बोर्डों के गठन का रास्ता साफ हुआ.

अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने पूर्व में संकल्प लिया था कि वे सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों के कल्याण के लिए 10 लाख रुपये जुटाएंगी, जिसे उन्होंने अब पूरा कर दिखाया है. जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी वे लगातार सरकार से यह मांग कर रही हैं कि सभी सरकारी अस्पतालों में इच्छामृत्यु के लिए मानक और सुलभ दिशा-निर्देश बनाए जाएं, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर और गंभीर बीमारियों से तड़प रहे मरीजों को राहत मिल सके.

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