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मोहम्मद अखलाक मॉब लिंचिंग केस में पीड़ित पक्ष को न्याय की आस

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में हुए मोहम्मद अखलाक मॉब लिंचिंग मामले में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया सुर्खियों में आई.

मोहम्मद अखलाक मॉब लिंचिंग केस में पीड़ित पक्ष को न्याय की आस
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में हुए मोहम्मद अखलाक मॉब लिंचिंग मामले में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया सुर्खियों में आई. अदालत ने दस साल पहले की इस घटना को समाज के खिलाफ गंभीर अपराध बताया.उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रेटर नोएडा के बिसाहड़ा गांव के बहुचर्चित अखलाक मॉब लिंचिंग मामले में अभियुक्तों के मुकदमे वापस लेने की कोर्ट से अपील की थी लेकिन कोर्ट ने यूपी सरकार की इस अर्जी को खारिज कर दिया. ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से दायर याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया. अदालत ने मामले की प्रतिदिन सुनवाई और सभी गवाहों के बयान दर्ज कराने के निर्देश दिए. मामले की अगली सुनवाई अब छह जनवरी को होगी.

दिल्ली से लगे यूपी के ग्रेटर नोएडा इलाके के बिसाहड़ा गांव में 28 सितंबर 2015 को घर में गोमांस रखने की अफवाह पर एक उन्मादी भीड़ ने 52 वर्षीय अखलाक को उनके घर से बाहर निकालकर इतना मारा-पीटा कि उनकी मौत हो गई. अखलाक के बेटे दानिश को भी इस घटना में गंभीर चोटें आई थीं. अखलाक की पत्नी इकरामन ने उसी रात थाने में शिकायत दर्ज कराई थी जिसमें दस नामजद और चार-पांच अज्ञात लोगों पर हत्या में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे.

घटना काफी सुर्खियों में रही और देश-विदेश की मीडिया में इसकी चर्चा होती रही. तीन महीने बाद यानी दिसंबर 2015 में पुलिस ने अपनी चार्जशीट दायर की जिसमें 15 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. बाद में इस मामले में अभियुक्तों की कुल संख्या 19 हो गई. साल 2016 में एक अभियुक्त की मौत हो गई और बाकी 18 अभियुक्त जमानत पर बाहर आ गए.

आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद, इस मामले की नियमित सुनवाई फरवरी 2021 से ही शुरू हो सकी क्योंकि कोविड-19 महामारी, बार-बार सुनवाई की तारीखें टलने और प्रशासनिक अड़चनों के चलते यह मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझा रहा.

सरकार क्यों वापस ले रही थी केस?

घटना के 10 साल बाद, पिछले महीने उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में एक आवेदन पत्र दाखिल किया, जिसमें कहा गया था कि इस मामले में गवाहों के बयानों में विरोधाभास है और ‘सामाजिक सद्भाव की बहाली' के लिए सरकार ने कोर्ट से केस को वापस लेने की अनुमति मांगी थी. लेकिन कोर्ट ने न सिर्फ इस अर्जी को खारिज कर दिया बल्कि सभी गवाहों के बयान दर्ज कराने और प्रतिदिन सुनवाई करने का निर्देश दिया.

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के पांच साल बाद भी थम नहीं रही मॉब लिंचिंग

सरकार ने जब कोर्ट में केस वापस लेने की अर्जी दाखिल की थी, तब अखलाक के परिजनों में काफी निराशा थी और उन्होंने राज्य सरकार के इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती भी दी है. अखलाक की पत्नी इकरामन ने अपनी याचिका में यूपी सरकार समेत कुल 21 लोगों को प्रतिवादी बनाया है, जिनमें सभी अभियुक्त भी शामिल हैं. इकरामन का कहना है कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में मुकदमा वापस लेना कानून का दुरुपयोग है और इससे पीड़ित परिवार के न्याय के अधिकार का हनन होता है.

दरअसल, सितंबर 2015 को हुई इस घटना के बाद अखलाक का पूरा परिवार उस गांव को छोड़कर चला गया था जहां वो पिछले सत्तर साल से रह रहा था. उसके बाद परिजन कभी वापस नहीं लौटे. अखलाक की पत्नी इकरामन बेगम घटना के बाद से ही आगरा में बड़े बेटे के साथ एक छोटे से फ्लैट में रह रही हैं. राज्य सरकार ने जब केस वापसी की अर्जी कोर्ट में डाली थी, तब इकरामन बेगम ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा था, "मेरा सब कुछ उजड़ गया. मेरा पति, मेरा घर, मेरे लोग. दुनिया ने मेरे पति को मरते देखा, हत्यारों को देखा लेकिन जांच करने वालों को कुछ नहीं दिख रहा है. यदि ऐसा ही है तो फिर इंसाफ कहां है.”

पीड़ित पक्ष को न्याय की उम्मीद

लेकिन अदालत में सरकार की अर्जी खारिज होने के बाद परिवार एक बार फिर न्याय की उम्मीद कर रहा है. अखलाक के परिवार के वकील युसूफ सैफी ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि न्यायालय के इस फैसले से न्याय की उम्मीद जगी है. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह मामला फिलहाल ट्रायल के दौर में है और गवाही जारी है. सरकार की ओर से केस वापसी की कोशिश कानून और तथ्य दोनों के खिलाफ थी. राज्यपाल की मंजूरी के बाद एडीजीसी द्वारा प्रस्तुत आवेदन में सामाजिक सद्भाव बनाए रखने जैसे तर्क पेश किए गए, लेकिन ये तर्क कानूनी दृष्टि से मजबूत नहीं थे.”

लिंचिंग पर मोहन भागवत के बयान पर सियासी हंगामा

साल 2015 में हुई इस घटना ने देशभर में आक्रोश पैदा किया. घटना के कुछ दिन बाद ही कुछ लोगों की गिरफ्तारियां हुईं लेकिन घटना के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे और इस घटना के बाद ही ‘मॉब लिंचिंग' शब्द व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगा. उसके बाद देश भर में इस तरह की कई घटनाएं सामने आईं.

क्रिसमस का विरोध

हाल के दिनों में भी धर्म के आधार पर पहचान कर लोगों को मारने-पीटने और परेशान करने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं. कुछ दिन पहले बिहार के नवादा जिले में मुस्लिम समुदाय के एक फेरीवाले को कुछ लोगों ने इतना मारा-पीटा कि उसकी मौत हो गई.

यही नहीं, पिछले कुछ दिनों से क्रिसमस को लेकर हिन्दू संगठनों का विरोध देखने को मिल रहा है. पिछले दिनों ऐसे ही विरोध के चलते हरिद्वार के एक होटल में क्रिसमस से जुड़ा आयोजन रद्द करना पड़ा, जबकि मध्य प्रदेश के जबलपुर की एक चर्च में जबरन घुसपैठ कर धर्मांतरण का आरोप लगाने की घटना सामने आई. सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में एक व्यक्ति ओडिशा में सैंटा क्लॉज कैप बेच रहे एक दुकानदार को परेशान करते दिख रहा है.

बच्चा चोरी के शक में हिंसक बनती भीड़ और पिटते अनजान लोग

वहीं, यूपी में बरेली जिले में एक चर्च के बाहर कुछ लोग जबरन हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे. सोशल मीडिया पर इसका वीडियो भी वायरल हो रहा है.

इन घटनाओं को लेकर ईसाई संगठन ‘द कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया' (सीबीसीआई) निंदा की है और कहा कि इससे भारत के संविधान में निहित धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को गंभीर नुकसान पहुंचा है. इस संबंध में कैथोलिक बिशप संगठन ने गृह मंत्री अमित शाह से अपील की है कि कानून का सख्त पालन हो और ईसाई समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, ताकि क्रिसमस शांतिपूर्वक मनाया जा सके.

(The above story first appeared on LatestLY on Dec 25, 2025 06:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).