तरुण तेजपाल: पावर और प्रिविलेज के खिलाफ न्याय की लड़ाई
करीब 13 सालों तक चले केस के बाद आखिरकार पूर्व पत्रकार तरुण तेजपाल को बलात्कार का दोषी मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई गई है.
करीब 13 सालों तक चले केस के बाद आखिरकार पूर्व पत्रकार तरुण तेजपाल को बलात्कार का दोषी मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई गई है. यह मामला यौन उत्पीड़न के खिलाफ न्याय की लड़ाई कितनी मुश्किल है इसकी एक नजीर बनकर सामने आया है.एक ‘परफेक्ट' रेप सर्वाइवर यानी बलात्कार पीड़िता कैसी होती है? कानूनी तौर पर इसे परिभाषित करना नामुमकिन सी बात लगती है. हालांकि जिस परिभाषा का कोई अस्तित्व ही नहीं है उसे आधार बनाते हुए ही 2021 में गोवा की एक सेशन अदालत ने बलात्कार के आरोपी तरुण तेजपाल को सारे आरोपों से बरी कर दिया था.
तब फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश क्षमा जोशी ने कहा था, "कथित यौन उत्पीड़न के बाद सर्वाइवर तस्वीरों में ‘खुश, हंसती हुई, सामान्य और अच्छे मूड' में नजर आई. सर्वाइवर ने अपराध के बाद वैसा व्यवहार नहीं दिखाया जैसा आमतौर पर यौन हिंसा के सर्वाइवर को दिखाना चाहिए. उसने दावा किया था कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ है, लेकिन वह किसी भी मायने में डरी या घबराई हुई नहीं दिखी.” 527 पन्नों के इस फैसले में तब तरुण तेजपाल के अपराध से अधिक विवेचना इस मुद्दे पर हुई थी कि जिसके साथ यह अपराध हुआ उसका व्यवहार कैसा था?
2013 से अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की लड़ाई लड़ रही सर्वाइवर के व्यवहार को देख कर दोषी तरुण तेजपाल को दोबारा रिहा कर दिया गया. इस फैसले के खिलाफ अपील की गई. अब इस फैसले के लगभग पांच सालों बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने दोबारा तरुण तेजपाल को बलात्कार का दोषी मानते हुए दस साल की कैद की सजा सुनाई है.
जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित एस जमसंडेकर की बेंच ने सुनवाई के दौरान सेशन कोर्ट के फैसले की आलोचना भी की और कहा कि उक्त फैसले में सर्वाइवर के व्यवहार को अनुचित तरीके से आधार बनाया गया.
एक केस, कई अदालत और 13 साल लंबी लड़ाई
अलग-अलग अदालतों में दोषी साबित होने, बरी होने और फिर दोषी साबित होने की लड़ाई 13 साल लंबी चली. यह केस सेशन कोर्ट से होता हुआ हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और फिर हाईकोर्ट पहुंचा. केस की फाइल एक अदालत से दूसरी अदालत के गलियारे में घूमती रही.
पेशे से संपादक और पत्रकार तरुण तेजपाल के खिलाफ 2013 में यौन उत्पीड़न का केस दर्ज किया गया था. तेजपाल ने उसी साल नवंबर के महीने में एक फाइव स्टार होटल की लिफ्ट में पीड़ित महिला का उत्पीड़न किया था. तरुण तेजपाल को गिरफ्तार किया गया. चार्जशीट दाखिल हुई. लेकिन 2014 में फैसले के खिलाफ अपील के बाद अग्रिम जमानत मिल गई.
सर्वाइवर तेजपाल की बेटी की दोस्त थी, तेजपाल के साथ उस वक्त काम कर रही थी और सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा था कि वह तरुण तेजपाल को अपने पिता जैसा मानती थी, भरोसा करती थी. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि यौन उत्पीड़न के अधिकतर मामलों में दोषी, सर्वाइवर का जानकार होता है. इस बिंदु को अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में रेखांकित किया है.
अदालत ने माना है कि तरुण तेजपाल का अपराध आईपीसी की धारा 376(2)(f) के तहत दो विशिष्ट श्रेणियों में आता है. जब अपराधी सर्वाइर के रिश्तेदार, अभिभावक या शिक्षक होने और उसके प्रति विश्वास या अधिकार के पद होता है और दूसरा, जब वह महिला पर नियंत्रण या प्रभुत्व जमाने में होता है. तेजपाल बतौर सर्वाइवर का जानकार और बॉस होना इन दोनों श्रेणियों में फिट बैठता है.
अपराधी का सामाजिक विशेषाधिकार उसके अपराध की सजा तय करता है?
हालांकि, तेजपाल की तरफ से बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही गई है. कानूनी मामलों पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक फैसले के बाद तरुण तेजपाल ने कहा, "मैं 62 साल का हूं और एक पॉलिटिकल विक्टिम हूं. मेरी दो बेटियां हैं, मेरी पत्नी है. हम इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगे.”
पेशे से पत्रकार और मीडिया रिसर्चर सिंथिया स्टीफन इस केस को बेहद नजदीक से देखती रही हैं. तीन दशकों से ज्यादा के अनुभव के साथ स्टीफन कहती हैं कि खुद को विक्टिम कहना किसी मजाक से कम नहीं है. जब आप विशेषाधिकार से आते हैं तो आप ऐसे बयान देते हैं. यह ऐसा केस जरूर है जो इतने लंबे वक्त तक लाइमलाइट में रहा. लेकिन मीडिया में जिस तरीके का वर्क कल्चर हमने देखा है उसे देखते हुए मैं कह सकती हूं कि फर्क बस इतना है कि उस लड़की ने आवाज उठाने का फैसला किया.
एक कानून ने कैसे बदल दिया केस का रुख
दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए गैंगरेप के बाद पूरा भारत गुस्से में उबल रहा था. सरकार पर दबाव था रेप जैसे अपराध के खिलाफ कानूनों को कठोर करने का, मौजूदा कानून में नए प्रावधान जोड़ने का और ऐसा हुआ भी. इस केस के बाद बलात्कार की कानूनी परिभाषा में बड़े बदलाव किए गए जिसने तरुण तेजपाल के केस को भी पटलकर रख दिया.
2012 के गैंगरेप केस के बाद जस्टिस जे एस वर्मा समिति गठित की गई. समिति ने संसद को कई सुझाव दिए जिनमें से लगभग सारे सुझावों को लागू किया गया. इन्हीं सुझावों के तहत बलात्कार की कानूनी परिभाषाबदली गई.
अब इस परिभाषा में उंगलियों, शरीर के दूसरे अंगों या किसी भी चीज के जरिए किए जाने वाले पेनिट्रेशन को भी शामिल किया गया. इससे पहले सिर्फ पेनिस द्वारा पेनिट्रेशन को ही रेप के तौर पर दर्ज किया जाता था. सिथिंया बताती हैं, "जब यह मामला सामने आया था तब एक बुजुर्ग महिला एक्टिविस्ट ने कहा था कि तरुण तेजपाल ने सिर्फ सर्वाइवर की योनि में ऊंगलियां डाली हैं, रेप नहीं किया. अगर ये परिभाषा नहीं बदलती तो शायद ऐसा फैसला नहीं आता. ये बदलाव इस केस के लिए बहुत अहम साबित हुआ.”
क्या हर केस को एक ही नजर से देखा जाता है?
भारत में महिला सुरक्षा का ये हाल है कि यहां हर दिन बलात्कार के 86 मामले दर्ज होते हैं. ध्यान रहे कि ये सिर्फ वे मामले होते हैं जो पुलिस रिकॉर्ड तक पहुंचते हैं. मुमकिन है इनमें से ज्यादातर मामलों की फाइलें अदालतों की खाक छानती मिलती हैं. आंकड़े यही बताते हैं. एनसीआरबी के मुताबिक 2012 से 2022 के बीच बलात्कार के केवल 27 से 28 फीसदी मामलों में ही दोषी को सजा मिली है.
हालांकि एकाध मामले अक्सर ‘हाई प्रोफाइल' की लिस्ट में शुमार हो जाते हैं जब आरोपी या दोषी जाना-माना हो. यह केस एक ऐसी पत्रिका के संपादक के खिलाफ चल रहा था जो उस दौर में अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए मशहूर थी. नतीजतन, सर्वाइवर के दावे से अधिक इसके इर्द गिर्द कहानियां बुनी गईं. खुद तरुण तेजपाल ने भी पत्रिका में खास राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ रिपोर्टों की वजह से खुद को निशाना बनाए जाने का दावा किया है.
जिस दशक में इस केस को लेकर सर्वाइवर न्याय के लिए एक अदालत से दूसरी अदालत घूम रही रही थी, ये वही दौर था जब भारतीय मीडिया इंडस्ट्री ने #MeToo आंदोलन देखा. कई संपादकों, पत्रकारों और मीडियाकर्मियों पर महिला मीडियाकर्मियों और पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए.
काम की जगह पर यौन उत्पीड़न
पत्रकार प्रिया रमानी ने तो कई सालों तक पूर्व मंत्री और पत्रकार एमजे अकबर के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ी और जीतीं भीं. तरुण तेजपाल का मामला भी ऐसे मामलों की कड़ी में एक और नजीरहै, खासकर कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न पर. तभी जस्टिस गोखले ने फैसले में रेखांकित किया कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न महिलाओं के करियर को गंभीर और स्थायी नुकसान पहुंचाता, उन्हें उन कारणों की सजा मिलती है जो उनके नियंत्रण से बाहर हैं.
अंतरराष्ट्रीय संस्था वान इन्फ्रा की एक रिपोर्ट बताती है कि मीडिया उद्योग में यौन उत्पीड़न एक व्यापक और वैश्विक समस्या है. इस मुद्दे पर 'विमेंस इन न्यूज' के एक शोध अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि औसतन 41% महिला पत्रकारों ने कार्यस्थल पर मौखिक या शारीरिक यौन उत्पीड़न का सामना किया है. फिर भी, 5 में से केवल 1 महिला ने ही इस घटना की रिपोर्ट की. औसतन 30% पत्रकारों ने मौखिक और या शारीरिक उत्पीड़न का अनुभव किया.
वह इंडस्ट्री जिस पर इन खबरों को सामने लाने का दारोमदार है, वह इंडस्ट्री के भीतर होने वाले इन उत्पीड़नों पर उसका रुख क्या होता है? स्टीफन कहती हैं, "मीटू की शुरुआत भारत में 2017 से पहले ही हो चुकी थी. ऐसे मामले पहले भी सामने आते रहे थे. हमारे सामने एमजे अकबर का उदाहरण है. शायद महिलाओं को पता नहीं था कि इनके खिलाफ आवाज कैसे उठाई जाए. बीते कुछ दशकों में भारतीय मीडिया ने ऐसी कई घटनाएं देखी हैं. हम हमेशा मीडिया से बेहतर होने की उम्मीद करते हैं लेकिन भूल जाते हैं कि यहां का वर्क कल्चर इसी समाज का हिस्सा है. जब पावर और प्रिविलेज मीडिया का हिस्सा बन जाता है तो हमें उसके नतीजे नजर आने लगते हैं.”