सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सीएम के पास सीधे अपनी बात रखने के बाद हटाए गए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को बहाल किया
सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायपालिका के उस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को सेवा में बहाल कर दिया है, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल और तत्कालीन मुख्यमंत्री के साथ उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों के समक्ष सीधे अपनी समस्या रखने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था.
नई दिल्ली, 16 फरवरी : सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायपालिका के उस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को सेवा में बहाल कर दिया है, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल और तत्कालीन मुख्यमंत्री के साथ उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों के समक्ष सीधे अपनी समस्या रखने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था. न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, जब वित्तीय कठिनाई में होता है, सीधे वरिष्ठों के सामने अपनी बात रखता है, लेकिन यह अपने-आप में बड़े कदाचार की श्रेणी में नहीं आता है, जिसके लिए सेवा से बर्खास्तगी की सजा दी जानी चाहिए.
यह मानते हुए कि जांच अधिकारी द्वारा दर्ज किए गए अपराध का निष्कर्ष विकृत है, पीठ ने अपीलकर्ता को सभी लाभों के साथ सेवा में बहाल करने का आदेश दिया. शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के आक्षेपित फैसले के साथ-साथ 30 अप्रैल 2007 के आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत अपीलकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. इससे पहले 2019 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता की रिट याचिका को योग्यताहीन बताते हुए खारिज कर दिया था.
याचिकाकर्ता - छत्रपाल - को बरेली जिला जजशिप में अर्दली, चतुर्थ श्रेणी के पद पर स्थायी आधार पर नियुक्त किया गया था. बाद में उसका तबादला कर दिया गया और बरेली की एक बाहरी अदालत के नजारत में प्रोसेस सर्वर के रूप में तैनात कर दिया गया. हालाँकि अपीलकर्ता ने नजारत शाखा में सेवा शुरू कर दी, लेकिन उसे अर्दली का पारिश्रमिक दिया जा रहा था.
व्यथित होकर उसने अनेक अभ्यावेदन दिये. जून 2003 में उसे निलंबित कर दिया गया और उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई. अपीलकर्ता पर आरोप लगाया गया कि उसने अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था और जिला न्यायाधीश और अन्य अधिकारियों के खिलाफ झूठे आरोप लगाए थे. दूसरा आरोप रजिस्ट्रार जनरल और राज्य सरकार के अन्य अधिकारियों को पत्र और अभ्यावेदन देने का था जिनमें तत्कालीन मुख्यमंत्री भी शामिल थे.
जांच के बाद, अपीलकर्ता को 2007 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. अपीलकर्ता के वकील ने शीर्ष अदालत के समक्ष तर्क दिया कि दी गई सजा की मात्रा अपराध के अनुरूप नहीं थी, भले ही यह माना जाए कि शिकायत में इस्तेमाल की गई भाषा उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली का घोर उल्लंघन है. अन्य विचारों के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि बरेली जिला न्यायालय के कई अन्य कर्मचारियों ने सीधे वरिष्ठों को अभ्यावेदन भेजा था, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी.
(The above story first appeared on LatestLY on Feb 16, 2024 05:09 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

