सुप्रीम कोर्ट का महिला आरक्षण विधेयक को तत्काल लागू करने की मांग वाली याचिका पर विचार से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मौजूदा जनगणना आंकड़ों के आधार पर 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने की मांग करने वाली एक वकील की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया.

Supreme Court | PTI

नई दिल्ली, 12 जनवरी : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मौजूदा जनगणना आंकड़ों के आधार पर 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने की मांग करने वाली एक वकील की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया. न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता - योगमाया एमजी - को इसी मुद्दे को उठाने वाली याचिकाओं के लंबित बैच में एक पक्षकार आवेदन दायर करने के लिए कहा.

पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता भी शामिल थे, ने याचिकाकर्ता को अपनी जनहित याचिका (पीआईएल) वापस लेने की अनुमति देते हुए कहा कि वह इस मामले में मुकदमेबाजी की बहुलता नहीं चाहती है. गौरतलब है कि शीर्ष अदालत पहले ही कांग्रेस नेता जया ठाकुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर विचार कर रही है, जिसमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम विधेयक 2023 को तत्काल लागू करने की मांग की गई है, जिसे पिछले साल सितंबर में संसद के एक विशेष सत्र में पारित किया गया था और इसमें लोकसभा और दिल्ली सहित सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए33 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य था. यह भी पढ़ें : BJP की अयोध्या जा रही लव कुश रथ यात्रा में शामिल हवनकुंड के ट्रक में लगी आग, चालक जख्मी

महिला आरक्षण कानून का इरादा वर्तमान लोकसभा या मौजूदा विधान सभाओं की संरचना में बदलाव करने का नहीं है, बल्कि उनके संबंधित कार्यकाल के पूरा होने पर या किसी अन्य कारण से भंग होने पर नए सिरे से गठित होने पर लागू होगा. यह अनुमान लगाया गया है कि परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद 2029 में महिलाओं के लिए कोटा पूरी तरह से देशभर में लागू हो जाएगा और 15 साल की अवधि तक जारी रहेगा. अपनी याचिका में, वकील योगमाया एमजी ने परिसीमन आयोग अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत 2001 या 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर संविधान (एक सौ अट्ठाईसवें संशोधन) विधेयक के तत्काल और समयबद्ध कार्यान्वयन को अनिवार्य करने के निर्देश देने की प्रार्थना की.

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