तारिक रहमान के गले की फांस बनता शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा
'अनुकूल माहौल' बनाने की शर्त के कारण बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान का प्रस्तावित भारत दौरा अनिश्चित हो गया है.
'अनुकूल माहौल' बनाने की शर्त के कारण बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान का प्रस्तावित भारत दौरा अनिश्चित हो गया है. ये सवाल भी उठने लगा है कि क्या शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा तारिक के गले की फांस बन गया है?बीते सप्ताह राजधानी ढाका में राजनयिक सूत्रों ने इस बात के ठोस संकेत दिए थे कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अगस्त के तीसरे सप्ताह में भारत के पहले बहुप्रतीक्षित दौरे पर जाएंगे. दिल्ली में केंद्रीय विदेश मंत्रालयों के सूत्रों ने भी यही बात कही थी. लेकिन रविवार को बांग्लादेश ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की अर्जी पर शीघ्र फैसला करने और कुछ दूसरे भगोड़े अपराधियों को सौंपने की मांग रख दी. ढाका ने इन मांगों को आगामी दौरे के लिए 'अनुकूल माहौल' तैयार करने की शर्त बताया.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एकेएम शहीदुल करीम ने राजधानी ढाका में पत्रकारों से कहा, "पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का प्रत्यर्पण और उस्मान हादी की हत्या के अभियुक्त को सौंपना दोनों देशों के बीच सबसे अहम मुद्दे हैं."
उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच प्रधानमंत्री के भारत दौरे के मुद्दे पर बातचीत चल रही थी. लेकिन भारत में शेख हसीना की वर्चुअल प्रेस कांफ्रेंस ने इस मुद्दे में रुकावट पैदा कर दी. करीम ने कहा, हमने हसीना के मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है.
बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं
बांग्लादेश में वर्ष 2024 में होने वाले विरोध प्रदर्शन का चेहरा रहे छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की बीते साल 12 दिसंबर को ढाका में गोली मार दी गई थी. एक सप्ताह बाद सिंगापुर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी. उसकी मौत के बाद देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए थे. पुलिस ने दावा किया था कि अभियुक्तों के संबंध शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी की छात्र शाखा से हैं. हमलावरों के कथित रूप से सीमा पार कर भारत में शरण लेने के दावों के बीच कुछ संगठनों ने इस हत्या में भारत का हाथ होने के आरोप लगाए थे. इसके बाद देश में भारत-विरोधी भावनाएं और भड़क उठी थीं.
जहां तक शेख हसीना का सवाल है उन्होंने अपनी सरकार के तख्तापलट के बाद पांच अगस्त, 2024 से ही भारत में शरण ले रखी है. बांग्लादेश की सरकार औपचारिक रूप से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर चुकी है. इस महीने हसीना ने दिल्ली में ऑनलाइन एक कार्यक्रम को संबोधित किया था. उससे बांग्लादेश की नाराजगी बढ़ी और प्रधानमंत्री तारिक रहमान का दौरा खटाई में पड़ गया.
शेख हसीना ने किया बांग्लादेश लौटने का ऐलान
दूसरी ओर, भारत सरकार की दलील है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए बांग्लादेश के अनुरोध पर तय कानूनी प्रक्रियाओं के तहत विचार किया जा रहा है. उसका कहना है कि फिलहाल शरीफ उस्मान हादी हत्याकांड के अभियुक्तों के भारत में होने के दावों की जांच चल रही है.
इसके साथ ही अब सवाल उठने लगा है कि क्या शेख हसीना के प्रत्यर्पण का सवाल प्रधानमंत्री तारिक रहमान और उनकी सरकार के गले की फांस बन गया है? रहमान पर शेख हसीना के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने का भारी दबाव है. खासकर कट्टर राजनीतिक दलों को यह बात कभी मंजूर नहीं होगी कि हसीना के प्रत्यर्पण की अर्जी पर कोई फैसला हुए बिना रहमान भारत दौरे पर जाएं.
विश्लेषकों का सवाल है कि क्या घरेलू राजनीति के दबाव में रहमान अपने मजबूत पड़ोसी देश के साथ आपसी संबंधों को भी दांव पर लगाने को तैयार हैं. हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद यह रिश्ते पहले से ही सबसे निचले स्तर पर हैं. तारिक रहमान सरकार के सत्ता संभालने के बाद इसमें बेहतरी की उम्मीद जगी थी. लेकिन अब तक सुधार के लक्षण नहीं नजर आ रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हसीना के मामले में सख्त रुख अपनाकर रहमान यह दिखा सकते हैं कि उनकी सरकार पिछली यानी हसीना सरकार से एकदम अलग रास्ते पर चल रही है."
उनका कहना था कि रहमान को जमात-ए-इस्लामी समेत कई कट्टरपंथी राजनीतिक ताकतों और सरकार में अपने दूसरे सहयोगियों के दबाव का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे तमाम संगठन हसीना सरकार से जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
बांग्लादेश की विदेश नीति पर घरेलू राजनीति का असर
कोलकाता के एक कालेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाली प्रोफेसर मालविका चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहती हैं, "रहमान के लिए मौजूदा राजनीतिक समीकरण बेहद मुश्किल है. हसीना के प्रत्यर्पण की मांग से पीछे हटने पर उनको देश में भारी आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. दूसरी ओर, इस मांग पर अड़े रहने से दोनों देशों के आपसी संबंधों को सुधारने की कोशिश खटाई में पड़ सकती है."
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "रहमान के लिए एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई वाली स्थिति है. हसीना के खिलाफ कड़ा रुख अपना कर वो देश में राजनीतिक संगठनों का समर्थन तो मजबूत कर सकते हैं. लेकिन इससे भारत के साथ कामकाजी संबंध बहाल करना मुश्किल हो सकता है."
विश्लेषकों का कहना है कि अब गेंद बांग्लादेश सरकार के पाले में है. रहमान को यह तय करना होगा कि वो हसीना के प्रत्यर्पण की मांग में किस हद तक जा सकते हैं और क्या इस मुद्दे पर वो भारत के साथ राजनयिक संबंधों को दांव पर लगाने के लिए भी तैयार हैं?