ओवेरियन कैंसर: अनदेखी से पनपती महिलाओं की एक जानलेवा बीमारी
बिना कोई साफ लक्षण दिखाए या स्पष्ट चेतावनी दिए, ओवेरियन कैंसर जैसी बीमारी चुपचाप शरीर में जड़ें फैलाती है.
बिना कोई साफ लक्षण दिखाए या स्पष्ट चेतावनी दिए, ओवेरियन कैंसर जैसी बीमारी चुपचाप शरीर में जड़ें फैलाती है. यही वजह है कि इसे 'साइलेंट किलर' कहा जाता है. जानिए क्यों हर महिला को इसके बारे में जागरूक होना चाहिए.वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड के अनुसार, साल 2022 में दुनिया भर में 3.24 लाख से अधिक महिलाओं में ओवेरियन कैंसर के नए मामले दर्ज किए गए. भारत में तो यह महिलाओं से संबंधित कैंसरों में तीसरा सबसे आम कैंसर है. हर साल देश में इसके 47,000 से अधिक नए मामले सामने आते हैं, जबकि लगभग 33,000 महिलाओं की जान इस बीमारी के कारण जाती है. कुल आंकड़ों के आधार पर भारत को इसमें विश्व में दूसरे स्थान पर बताया गया है, जो इस बीमारी के बढ़ते बोझ और इससे जुड़ी गंभीर चुनौतियों को दिखाता है.
ओवेरियन कैंसर महिलाओं में होने वाला एक गंभीर कैंसर है. यह कैंसर तब होता है, जब अंडाशय (ओवरी) की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और धीरे-धीरे ट्यूमर का रूप ले लेती हैं. चिंता की बात यह है कि ओवेरियन कैंसर का पता अक्सर देर से चलता है. शुरुआती चरण में इसके लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि उन्हें आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है. यही वजह है कि इसे "साइलेंट किलर” भी कहा जाता है.
सबसे ज्यादा खतरा किसे?
डॉ.अभिषेक शंकर दिल्ली के एम्स अस्पताल में रेडीऐशन ऑन्कोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं. उनका कहना है, ओवेरियन कैंसर काफी हद तक हॉर्मोन से जुड़ी बीमारी है. जब महिला के शरीर में लंबे समय तक एस्ट्रोजन हॉर्मोन का प्रभाव बिना संतुलन के बना रहता है, तो इस कैंसर के होने का खतरा बढ़ सकता है. एस्ट्रोजन महिलाओं में पाया जाने वाला महत्वपूर्ण हॉर्मोन है और यह महिलाओं के अंडाशय यानी ओवरीज में बनता है. यह हॉर्मोन किशोरावस्था के दौरान ब्रेस्ट के विकास, पिरियड्स को नियंत्रित करने और गर्भावस्था के लिए शरीर को तैयार करने में मदद करता है.
वहीं, जेनेटिक कारण भी ओवेरियन कैंसर के जोखिम को काफी हद तक बढ़ा सकते हैं. डॉ. शंकर बताते हैं कि जिन महिलाओं के परिवार में मां, बहन, बेटी या अन्य करीबी रिश्तेदार को ओवेरियन या ब्रेस्ट कैंसर रह चुका है, उनमें इस बीमारी के होने की संभावना बढ़ जाती है.
बदलती जीवनशैली भी इसमें अहम भूमिका निभा रही है. भारत में पहले की तुलना में महिलाएं अब कम बच्चे पैदा कर रही हैं. विवाह की औसत आयु बढ़ने से वे देरी से गर्भधारण कर रही हैं. साथ ही, भारत में मोटापा और वायु प्रदूषण की समस्या जोखिम को बढ़ा देती है. डॉ. शंकर ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया कि ओवेरियन कैंसर के मामले में सबसे बड़ा जोखिम कारक कोई आदत या बीमारी नहीं, बल्कि महिला होना है. ऐसे में जागरूकता और सतर्कता ही बचाव की पहली शर्त है.
शुरुआती लक्षणों को मामूली समझने की भूल
इस कैंसर की शुरुआती पहचान इसलिए भी कठिन है, क्योंकि इसके लिए प्रभावी और विश्वसनीय स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं है. इसके लक्षण भी काफी सामान्य से लगने वाले होते हैं. पेट में दर्द या भारीपन, पेट फूलना, पेट का आकार बढ़ना, भूख कम लगना या थोड़ा-सा खाने पर ही पेट भर जाने का एहसास, ये सभी ऐसे संकेत हैं जिन्हें अक्सर गैस, अपच या अन्य पाचन संबंधी समस्याओं से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए महिलाएं इन समस्याओं को अपनी रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी की छोटी-मोटी तकलीफें मानकर नजरअंदाज कर देती हैं.
इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक ओवेरियन कैंसर का खतरा 35 वर्ष की उम्र के बाद बढ़ने लगता है और 55 से 64 वर्ष की उम्र के बीच यह सबसे अधिक देखा जाता है. इस बीमारी को लेकर गंभीरता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि लगभग 75 फीसदी मामलों में इसका पता तब चलता है, जब बीमारी काफी फैल चुकी होती है. यही कारण है, जिससे इसका इलाज बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
सतर्कता से संभव है समय पर पहचान
इस बीमारी का समय रहते पता चले, इसके लिए डॉ. शंकर बताते हैं कि हर महिला अपने शरीर को बेहतर जानती और समझती हैं. अगर उन्हें अपने शरीर को लेकर कुछ भी असामान्य महसूस हो, तो विश्वसनीय डॉक्टर से परामर्श जरूर लें. भारत में अक्सर महिलाएं अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को तब तक नजरअंदाज करती रहती हैं, जब तक वे गंभीर न हो जाएं. यही लापरवाही कई बार बीमारी को और ज्यादा जटिल बना देती है. इसलिए किसी भी लगातार बनी रहने वाली परेशानी को हल्के में लेना ठीक नहीं है.
कैंसर के मरीजों का जीवन लंबा करने वाली गोली
ओवेरियन कैंसर को शुरुआती चरण में पहचानना बेहद मुश्किल होता है. अन्य कई कैंसरों में शुरुआती संकेत मददगार साबित होते हैं, लेकिन ओवेरियन कैंसर के मामले में ऐसा हमेशा संभव नहीं होता. डॉ. शंकर के मुताबिक, फिलहाल ऐसा कोई विश्वसनीय स्क्रीनिंग टेस्ट नहीं है. यही कारण है कि अधिकांश मरीज डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं, जब कैंसर तीसरी या चौथी स्टेज में पहुंच चुका होता है.
भारत में इस बीमारी के देर से पता चलने की एक बड़ी वजह जागरूकता की कमी भी है. ओवेरियन कैंसर की चुनौती भले बड़ी हो, लेकिन जागरूकता, सतर्कता और समय पर चिकित्सकीय सलाह ही इसके खिलाफ सबसे मजबूत हथियार हैं.कैंसर से मौतों में चीन और अमेरिका के बाद तीसरे नंबर पर है भारत