Old Monk Rum Shortage in Maharashtra: मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में इन दिनों लोकप्रिय डार्क रम ब्रांड 'ओल्ड मोंक' (Old Monk) की भारी कमी देखी जा रही है. वाइन शॉप्स, बार और क्लबों में इसकी अनुपलब्धता के कारण सोशल मीडिया पर तरह-तरह की अफवाहें उड़ रही हैं, जिनमें ब्रांड के बंद होने या मालिकाना हक के विवाद जैसी बातें शामिल हैं. हालांकि, यह संकट पूरी तरह से अस्थायी है, जिसके पीछे उत्पादन क्षमता में कमी, सेना की मांग में बढ़ोतरी और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की हालिया सख्ती जैसे प्रमुख कारण हैं.
उत्पादन क्षमता और आपूर्ति श्रृंखला में बड़ी रुकावट
ओल्ड मोंक की इस किल्लत का प्राथमिक कारण इसके उत्पादन केंद्रों (मैन्युफैक्चरिंग फुटप्रिंट) में आई बड़ी कमी है. पिछले कुछ वर्षों में लखनऊ और चेन्नई में स्थित ओल्ड मोंक के स्थायी उत्पादन प्लांट बंद हो चुके हैं. यह भी पढ़े: Mumbai Dry Days List January 2026: मुंबई में 13 से 16 जनवरी तक बंद रहेंगी शराब की दुकानें, चुनाव और त्योहारों के चलते 'ड्राई डे' घोषित; चेक लिस्ट
अब इस ब्रांड का निर्माण मुख्य रूप से महाराष्ट्र के खोपोली में स्थित एकमात्र प्रमुख प्लांट पर निर्भर है. डिस्ट्रीब्यूटर्स और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े सूत्रों के अनुसार, देश भर में इस रम की भारी मांग को अकेले पूरा करने के लिए इस प्लांट की क्षमता पर्याप्त नहीं है.
इसके अतिरिक्त, भारतीय रक्षा बलों (Defense Forces) की ओर से इस ब्रांड की सीधी मांग में काफी बढ़ोतरी हुई है. चूंकि सैन्य कैंटीन और रक्षा आपूर्ति को नियमानुसार प्राथमिकता दी जाती है, इसलिए सीमित उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा सीधे सेना को भेज दिया जाता है. इसके कारण सामान्य खुदरा दुकानों और व्यावसायिक बारों के लिए बेहद कम स्टॉक बचता है. मानसून के सीजन को देखते हुए स्थानीय दुकानदारों द्वारा स्टॉक जमा करने (Hoarding) की प्रवृत्ति ने भी खुले बाजार में इसकी कमी को बढ़ा दिया है.
FSSAI की कड़ाई और लेबलिंग से जुड़े नए नियम
लॉजिस्टिक्स के अलावा, रेगुलेटरी अथॉरिटी FSSAI की बढ़ती सख्ती भी इस किल्लत की एक बड़ी वजह है. हाल ही में खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने देश के कई शराब निर्माताओं को नियमों के उल्लंघन के मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं.
FSSAI की यह जांच मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर केंद्रित है:
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प्रतिबंधित फ्लेवर एडिटिव्स: नियमों के अनुसार रम, व्हिस्की, वोदका और अन्य स्पिरिट्स में कृत्रिम फ्लेवर मिलाना प्रतिबंधित है. इनका स्वाद पूरी तरह से प्राकृतिक फर्मेंटेशन से आना चाहिए.
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भ्रामक आयु (Age) के दावे: FSSAI ने उन ब्रांड्स पर आपत्ति जताई है जो अपने लेबल पर "aged" या पुरानी होने का दावा तो करते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करते कि घोषित उम्र ब्लेंड में इस्तेमाल की गई सबसे कम उम्र की स्पिरिट को दर्शाती है.
ओल्ड मोंक के लोकप्रिय संस्करण "सेवन इयर्स ओल्ड ब्लेंडेड" (Seven Years Old Blended) के लेबल को भी इन कड़े मानकों को पूरा करना होगा. FSSAI द्वारा लेबल सुधार के आदेश के बाद, उद्योग के स्थापित नियमों के तहत मौजूदा स्टॉक को बाजार से वापस (Recall) लेना पड़ता है, जिसके बाद नए लेबल के साथ इसे फिर से पंजीकृत कर बाजार में उतारा जाता है. इस री-रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के चलते दुकानों से बोतलें अचानक गायब हो गई हैं.
एथेनॉल ब्लेंडिंग से जुड़ी अफवाहें बेबुनियाद
सोशल मीडिया पर कुछ दावों में यह भी कहा जा रहा था कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की सरकार की नीति के कारण शीरे (Molasses) की भारी कमी हो गई है, जिससे शराब कंपनियां प्रभावित हुई हैं.
हालांकि, उद्योग जगत के विशेषज्ञों ने इन दावों को खारिज कर दिया है. हालांकि शीरा रम का एक मुख्य घटक है, लेकिन केंद्र सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के और अधिशेष चावल जैसे अनाज-आधारित विकल्पों को भी बढ़ावा दिया है. इससे गन्ने के शीरे पर दबाव काफी कम हुआ है, जिससे स्पष्ट होता है कि कच्चे माल की कमी इस किल्लत का मुख्य कारण नहीं है.
बाजार में कब तक होगी ओल्ड मोंक की वापसी?
कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनीज (CIABC) ने स्पष्ट किया है कि वे FSSAI के नियमों का पूरा सम्मान करते हैं और लेबलिंग के मुद्दों को जल्द सुलझाने के लिए बातचीत जारी है.
यह कमी किसी भी तरह से इस ऐतिहासिक ब्रांड के बंद होने का संकेत नहीं है. कपिल मोहन के निधन के बाद हेमंत और विनय मोहन के नेतृत्व में ब्रांड का संचालन सुचारू रूप से चल रहा है. खोपोली प्लांट में उत्पादन अभी भी जारी है और उम्मीद है कि मानसून सीजन के खत्म होने तक, जैसे ही आपूर्ति व्यवस्था और नियामक समीक्षाएं पूरी होंगी, ओल्ड मोंक का स्टॉक बाजार में पहले की तरह सामान्य हो जाएगा.













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