Ravindra Phatak Cheating Case: शिवसेना नेता रविंद्र फाटक और उनकी पत्नी सहित 7 अन्य को कोर्ट से बड़ी राहत, ₹26 करोड़ की ठगी के मामले में सभी बरी

शिवसेना नेता और ठाणे से विधान परिषद सदस्य (MLC) रविंद्र फाटक, उनकी पत्नी सहित सात अन्य लोगों को ₹26 करोड़ की ठगी के एक दशक पुराने मामले में बड़ी राहत मिली है. मुंबई की गिरगांव मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अदालत ने सभी आरोपियों को इस मामले में बरी कर दिया.

(प्रतिकात्मक तस्वीर)

Ravindra Phatak Cheating Case: शिवसेना नेता और ठाणे से विधान परिषद सदस्य (MLC) रविंद्र फाटक, उनकी पत्नी सहित सात अन्य लोगों को ₹26 करोड़ की ठगी के एक दशक पुराने मामले में बड़ी राहत मिली है. मुंबई की गिरगांव मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अदालत ने सभी आरोपियों को इस मामले में बरी कर दिया. यह मामला 2015 में मुंबई के एमआरए मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था. मामला कोर्ट में जाने के बाद से ही सुवाई चल रही थी. लेकिन बुधवार 13 जुलाई को कोर्ट ने इन आरोपियों के पक्ष में फैसला सुनते हुए बरी कर दिया.

व्यावसायिक सौदे को ठगी का रूप देने का आरोप

व्यवसायी प्रेमप्रकाश सराओगी, जो सावंतवाड़ी के सटेली में खनिज व्यापार से जुड़े हैं. उन्होंने शिकायत में आरोप लगाया था कि रविंद्र फाटक ने 2008 में स्थानीय विवाद सुलझाने के बहाने उनसे संपर्क किया और 2011 में उन्हें रियल एस्टेट में निवेश की सलाह दी. दोनों ने मिलकर ब्लू स्टार मेटल सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी बनाई, जिसमें सराओगी की 50% हिस्सेदारी थी. फाटक और उनकी पत्नी ने सराओगी की मुलाकात कपूरबा एंड कंपनी से करवाई, जिनके पास ठाणे के पंचपाखाड़ी और माजीवाड़ा में प्लॉट्स थे. यह भी पढ़े: Mumbai Esther Anuhya Case: आरोपी चंद्रभान सनाप को SC से बड़ी राहत, सॉफ्टवेयर इंजीनियर ईस्टर अनुहाया से रेप-हत्या मामले में बरी, कोर्ट ने सुनवाई थी मौत की सजा

सराओगी के आरोप

सराओगी ने दावा किया कि उन्होंने फाटक की सलाह पर ₹13 करोड़ जमीन खरीदने और ₹15 करोड़ अतिक्रमण हटाने के लिए दिए। बाद में, जब बिक्री समझौता हुआ, तो वह उनके द्वारा देखे गए ड्राफ्ट से अलग था, जिसके आधार पर उन्होंने फाटक पर ₹26 करोड़ की ठगी का आरोप लगाया.

रविंद्र फाटक के वकील की दलील

रविंद्र फाटक के वकील प्रेरक चौधरी ने कोर्ट में दलील दी कि यह मामला मूल रूप से एक दीवानी (सिविल) विवाद था, जिसे आपराधिक रूप दिया गया. उन्होंने बताया कि 2019 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका था, जिसे चार्जशीट में शामिल किया गया था. इसके बावजूद मामला ट्रायल तक पहुंचा. सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता कोर्ट में पेश नहीं हुआ, और अभियोजन पक्ष केवल तीन जांच अधिकारियों की गवाही ही पेश कर सका. सबूतों के अभाव और आपसी समझौते को देखते हुए, अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया.

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