Marital Rape Case: 'विवाह महिला की स्वायत्तता का अंत नहीं'; सुप्रीम कोर्ट पहले सुनेगा कर्नाटक हाईकोर्ट का 'सेक्स स्लेव' फैसला, अंतिम सुनवाई तय

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने बुधवार, 9 सितंबर 2026 को निर्णय लिया कि वह संविधानिक वैधता पर जाने से पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के उस बहुचर्चित फैसले के खिलाफ दायर अपील की पहले सुनवाई करेगी, जिसमें पत्नी को 'सेक्स स्लेव' (यौन गुलाम) की तरह रखने के आरोपी पति के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी.

Supreme Court (Photo Credits: ANI/File Image)

नई दिल्ली: वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को आपराधिक कृत्य घोषित करने और कानून में मौजूद अपवाद को चुनौती देने वाली याचिकाओं के बैच पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई का दायरा स्पष्ट किया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने तय किया है कि अदालत सबसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के उस निर्णय से जुड़ी अपील पर विचार करेगी, जिसमें आरोपी पति पर दुष्कर्म की धाराओं के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी दी गई थी.

कानूनी पोर्टल Bar and Bench की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने सभी पक्षों को याचिकाओं व दस्तावेजों का संकलन पूरा करने का निर्देश देते हुए मामले को तीन सप्ताह बाद अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध कर दिया है. यह भी पढ़ें: Kerala High Court: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत निकाह भी नहीं बचाएगा; 18 साल से कम उम्र की पत्नी से शारीरिक संबंध POCSO और रेप के तहत अपराध

सबसे पहले क्यों होगी कर्नाटक के 'सेक्स स्लेव' केस की सुनवाई?

पीठ ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक बलात्कार के मुद्दे पर अदालत के सामने दो मुख्य कानूनी सवाल हैं:

  1. क्या कानून में मौजूद अपवाद को रद्द किए बिना ही उसकी इतनी व्यापक व्याख्या की जा सकती है कि कुछ गंभीर मामलों में पति पर मुकदमा चल सके?
  2. क्या कानून में दिया गया यह अपवाद स्वयं असंवैधानिक और मनमाना है?

कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का बचाव कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने पीठ के समक्ष दलील दी कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने मामले के गंभीर तथ्यों—जहां पत्नी को वस्तुतः एक 'यौन गुलाम' की तरह प्रताड़ित किया गया था—को देखते हुए मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी. जयसिंह ने कहा कि वह कानून के अपवाद को सीधे खारिज किए बिना यह साबित करना चाहती हैं कि वर्तमान कानूनी ढांचे की व्याख्या के तहत ही ऐसे जघन्य आचरण पर आपराधिक मुकदमा कायम रखा जा सकता है.  सीजेआई सूर्यकांत ने माना कि यह एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है कि क्या स्पष्ट अपवाद वाले प्रावधान की ऐसी व्याख्या संभव है.

'विवाह से नहीं छिनती व्यक्तिगत स्वायत्तता': जस्टिस बागची

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने विवाहित महिलाओं की सुरक्षा और स्वाभिमान को लेकर संवेदनशील टिप्पणी की:

निर्भया कांड के बाद के संशोधन और BNS का हवाला

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने तर्क दिया कि व्याख्या और संवैधानिकता के मुद्दों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता:

दिल्ली हाईकोर्ट के खंडित फैसले से शीर्ष अदालत पहुंचा विवाद

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई 2022 के उस खंडित निर्णय (Split Verdict) के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जिसमें दो जजों की पीठ एकराय नहीं हो सकी थी:

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपने जवाब की प्रतियां सभी पक्षों को दो दिनों के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है. तीन सप्ताह बाद होने वाली अंतिम सुनवाई में देश की सर्वोच्च अदालत इस जटिल और संवेदनशील कानूनी विवाद पर निर्णायक फैसला तय करेगी.

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