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केन-बेतवा परियोजना: ‘विकास’ की राह में क्यों खड़े हैं ग्रामीण?

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को सरकार बुंदेलखंड की जल समस्या का समाधान बताती है, लेकिन जिन गांवों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है वहां इसका विरोध काफी तेज हो गया है.

केन-बेतवा परियोजना: ‘विकास’ की राह में क्यों खड़े हैं ग्रामीण?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को सरकार बुंदेलखंड की जल समस्या का समाधान बताती है, लेकिन जिन गांवों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है वहां इसका विरोध काफी तेज हो गया है.बुंदेलखंड को पानी चाहिए, इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो या किसी तरह का विवाद हो. लेकिन सवाल यह है कि उस पानी की कीमत कौन चुकाएगा? यही सवाल इन दिनों मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में हो रहे आंदोलन के केंद्र में है. सरकार इसे बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने वाली परियोजना बताती है, जबकि प्रभावित गांवों के लोग कहते हैं कि विकास के नाम पर उनका घर, खेत और आजीविका दांव पर लगा दी गई है.

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में पिछले दो हफ्ते से केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में ग्रामीण कई तरह से आंदोलन कर रहे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना से प्रभावित ग्रामीणों के मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही बांध का निर्माण शुरू कर दिया गया है.

ग्रामीणों ने दो महीने पहले भी आंदोलन किया था लेकिन तब अधिकारियों ने उन्हें सब ठीक कर लेने का आश्वासन देकर आंदोलन स्थगित करा दिया था. ग्रामीणों का आरोप है कि आश्वासन पूरा किए बिना ही काम फिर से शुरू कर दिया गया है.

केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली प्रमुख नदी जोड़ो परियोजना है और इसे राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम की पहली बड़ी परियोजना माना जाता है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 45 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना से 11 लाख हेक्टेयर सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल और 130 मेगावॉट बिजली उत्पादन का लक्ष्य है. इसके लिए छतरपुर और पन्ना के 21 गांव प्रभावित होंगे.

प्रभावित गांवों में ज्यादातर आदिवासी हैं. ग्रामीणों का कहना है कि उनकी लड़ाई परियोजना रोकने की नहीं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित करने की है. अपनी मांगों को लेकर वे छतरपुर जिले में केन की सहायक बराना नदी के किनारे पिछले 15 दिन से आंदोलन कर रहे हैं.

‘फांसी सत्याग्रह' और ‘चिता आंदोलन'

प्रदर्शनकारी सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए विरोध के नए तरीके अपना रहे हैं. पिछले दिनों प्रभावित आदिवासी महिलाओं ने आंदोलन को नया रूप देते हुए प्रतीकात्मक 'फांसी सत्याग्रह' और ‘चिता आंदोलन' शुरू कर दिया है. महिलाओं ने गले में फांसी का फंदा डालकर सरकार से मांग की कि यदि उन्हें उचित पुनर्वास और न्याय नहीं मिल सकता, तो कम से कम इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि परियोजना के कारण हजारों परिवारों की जमीन, जंगल, जल स्रोत, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान छिन गई है. उनका आरोप है कि कई परिवारों को अवैध रूप से बेदखल किया गया, झूठे मुकदमे दर्ज किए गए और बिजली कनेक्शन तक काट दिए गए. साथ ही परियोजना प्रभावितों की सूची तैयार करने में भी अनियमितताएं बरती गईं.

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर पिछले 13 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं. उनका आरोप है कि प्रशासन ने अप्रैल महीने में किए गए आश्वासन अब तक पूरे नहीं किए हैं.

डीडब्ल्यू से बातचीत में अमित भटनागर कहते हैं, "प्रशासन के रवैये की वजह से पचास हजार लोग बेघर हो गए हैं. दरअसल, सरकार यह नहीं समझना चाहती है कि विस्थापन का मतलब सिर्फ घर बदलना नहीं होता है बल्कि विस्थापन में एक पूरा समुदाय, समाज और इकोसिस्टम खत्म होता है. ऐसे में प्रभावितों के लिए सरकार को थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए. लेकिन सरकार यह सब काम डरा-धमकाकर कराना चाहती है.”

आंदोलन में ज्यादातर आदिवासी महिलाएं हैं. उन्हीं में से एक लक्ष्मी डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "अप्रैल में जब हमने चिता आंदोलन किया था, उसके बाद प्रशासन ने हमारी मांगें पूरी करने के वादे किए थे लेकिन उस वक्त जितने वादे किए गए थे, उनमें से एक का भी पालन नहीं किया गया. बल्कि हम लोगों को ही डराने-धमकाने का का काम किया गया. फर्जी केस, गैरकानूनी बेदखली, बिजली काट देना, स्कूल तोड़ना जैसे गैरकानूनी और अमानवीय कृत्य किए जा रहे हैं और लोग खौफ में हैं.”

प्रशासन का पक्ष

लेकिन प्रशासन का कहना है कि पुनर्वास पैकेज पहले ही बढ़ाया जा चुका है. छतरपुर के जिला कलेक्टर पार्थ जायसवाल के मुताबिक, अप्रैल में जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा कर दिया गया है और अब जो मांगें हैं वो केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से संबंधित नहीं हैं.

डीडब्ल्यू से बातचीत में छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जायसवाल कहते हैं, "प्रदर्शनकारियों से लगातार बातचीत चल रही है. अप्रैल में उठाई गई ज्यादातर मांगों पर कार्रवाई की जा चुकी है. राज्य मंत्रिमंडल ने हाल ही में राहत एवं पुनर्वास पैकेज बढ़ाने को मंजूरी दी है, लेकिन अब प्रदर्शनकारी और ज्यादा मुआवजे की मांग कर रहे हैं.”

दरअसल, इस आंदोलन में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना के अलावा मझगांव और रुंझ सिंचाई परियोजना से विस्थापित हुए लोग भी शामिल हैं. आंदोलन इन परियोजनाओं में हुए कथित भ्रष्टाचार और विस्थापितों के सही पुनर्वास की मांग को लेकर तो है ही, साथ ही पन्ना टाइगर रिजर्व के 43 लाख पेड़ों को बचाने के लिए भी है.

आंदोलनकारियों की मांग है कि गांव के विस्थापन की स्थिति में नया गांव बसाकर दिया जाए, परिवार में सबको मसलन पति और पत्नी को अलग-अलग आर्थिक राहत दी जाए, फर्जी ग्राम सभा की बैठकों पर रोक लगे और तीनों परियोजना के लिए हुई जनसुनवाई और सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं.

केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर 2021 में मंजूरी दी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2024 में इसे शुरू किया था. इसका मकसद यमुना की सहायक नदियों केन और बेतवा नदियों को जोड़कर सूखा प्रभावित बुंदेलखंड इलाके में पानी पहुंचाना है.

सरकारी अनुमानों के मुताबिक केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना में मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिले के 21 गांव डूब जाएंगे और करीब सात हजार परिवार विस्थापित होंगे. यही नहीं, इस प्रोजेक्ट के तहत, पन्ना नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के अंदर केन नदी पर एक बांध बनाया जाएगा.

नदियों को जोड़ने से पहले उन्हें बचाने की जरूरत

न सिर्फ विस्थापन और मुआवजा बल्कि पर्यावरण और वन्य जीव को लेकर भी इस परियोजना पर कई सवाल उठ रहे हैं. बुंदेलखंड के सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने इस बात पर सवाल उठाए हैं कि केन नदी में 'अतिरिक्त' पानी है और चेतावनी दी है कि यह परियोजना पर्यावरण और आर्थिक रूप से विनाशकारी होगा.

डीडब्ल्यू से बातचीत में आशीष सागर कहते हैं, "केन छोटी नदी है इसका पानी बड़ी नदी बेतवा में डालना है. सरकार मानती है कि केन में बाढ़ से सरप्लस पानी बचता है जिसको बेतवा में डालकर सिंचाई का साधन मुहैया कराया जा सकता है जबकि केन नदी का हाल यह है कि साल के आठ महीने इसमें घुटनों के नीचे पानी रहता है. दूसरे, मौरम खनन के जरिए इसे मृतप्राय बना दिया गया है.”

आशीष सागर आगे कहते हैं, "यहां बन रहे दौधन बांध से नौ हजार हेक्टेयर से ज्यादा घना जंगल डूब जाएगा जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर जोन का करीब छह हजार हेक्टेयर इलाका भी शामिल है. यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि यह एक जीवित इकोसिस्टम है जो बाघ, घड़ियाल, डॉल्फिन, गिद्ध, चिंकारा, भेड़ियों और दुर्लभ महाशीर मछलियों का घर है. प्रोजेक्ट में वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी के वन्यजीव और गिद्धों का प्रजनन केंद्र भी खत्म हो जाएगा. यानी इस परियोजना से यह पूरा इकोसिस्टम नष्ट हो जाएगा. इसे आप कहां विस्थापित करेंगे?”

केन-बेतवा परियोजना पूरी होने पर बुंदेलखंड के बड़े हिस्से को पानी मिलने की उम्मीद है लेकिन छतरपुर के आंदोलनकारी गांवों में फिलहाल चर्चा सिंचाई की नहीं, विस्थापन की है. यही वजह है कि यह विवाद अब सिर्फ एक बांध या नदी जोड़ो परियोजना का नहीं, बल्कि उस सवाल का बन गया है जो भारत की लगभग हर बड़ी विकास परियोजना के साथ उठता है- क्या विकास की कीमत सबसे ज्यादा वही लोग चुकाते हैं, जिन्हें विकास का लाभ सबसे बाद में मिलता है?

(The above story first appeared on LatestLY on Jul 20, 2026 08:30 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).