Karnataka High Court Decision: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान कहा है कि कोई भी पति केवल इस आधार पर तलाक की मांग नहीं कर सकता कि उसकी अपनी पत्नी या विवाह में रुचि खत्म हो गई है. उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू कानून के तहत विवाह एक पवित्र संस्कार है, न कि कोई व्यावसायिक अनुबंध. यदि कोई पति स्वयं दांपत्य जीवन फिर से शुरू करने से इनकार करता है, तो वह अपनी ही गलती का लाभ उठाकर तलाक का हकदार नहीं बन सकता.
याचिका खारिज
न्यायालय ने पति द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक याचिका को अस्वीकार कर दिया गया था और पत्नी द्वारा दायर दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) की अर्जी को स्वीकार किया गया था. पति ने दलील दी थी कि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और उनके बीच का रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है, इसलिए उसे तलाक दिया जाना चाहिए.
जिरह में पति ने खुद कबूली थी रुचि न होने की बात
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने साक्ष्यों और रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि पारिवारिक अदालत में जिरह के दौरान पति ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि उसने पत्नी के साथ फिर से रहना शुरू नहीं किया क्योंकि उसकी अब इसमें कोई रुचि नहीं बची थी. अदालत ने माना कि पत्नी ने कभी भी अलग रहने की जिद नहीं की थी और न ही उसने ऐसा कोई व्यवहार किया था जिससे साथ रहना असंभव हो.
खुद की गलती का फायदा उठाने की इजाजत नहीं दे सकता कानून
उच्च न्यायालय की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पति अपनी ही गलतियों और निष्क्रियता का फायदा उठाकर विवाह समाप्त करने का दावा नहीं कर सकता. अदालत ने जोर देकर कहा कि एक बार शादी होने के बाद यह जीवनभर का बंधन होता है. जीवनसाथी में रुचि न रहने का मनमाना कारण देकर कोई भी पक्ष कानूनी जिम्मेदारियों और वैवाहिक प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हट सकता.













QuickLY