आधुनिकीकरण की मार: ट्रॉली, लिफ्ट और एस्केलेटर ने छीना कुलियों का काम; बोले- 'अब हम सिर्फ पूछताछ के काम आते हैं'
भारतीय रेलवे स्टेशनों पर आधुनिक सुविधाओं जैसे एस्केलेटर, लिफ्ट और पहियेदार ट्रॉली बैग के बढ़ते चलन ने कुलियों की आजीविका को गहरे संकट में डाल दिया है. आमदनी घटने से परेशान कुलियों ने अब रेलवे से ग्रुप-डी में नौकरी देने की मांग की है.
नई दिल्ली, 15 जून 2026. भारतीय रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प और आधुनिकीकरण जहां यात्रियों के सफर को सुगम बना रहा है, वहीं रेलवे की रीढ़ माने जाने वाले कुलियों (सहायकों) के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. स्टेशनों पर बढ़ती आधुनिक सुविधाओं जैसे स्वचालित सीढ़ियां (एस्केलेटर), लिफ्ट और यात्रियों द्वारा पहिये वाले ट्रॉली बैग के बढ़ते इस्तेमाल ने कुलियों के पारंपरिक काम को लगभग खत्म कर दिया है. दैनिक आय में भारी गिरावट से परेशान देश भर के कुलियों ने अब सरकार से राहत की गुहार लगाते हुए रेलवे के ग्रुप-डी (Group-D) में शामिल करने की मांग तेज कर दी है.
'पूछताछ केंद्र' बनकर रह गए हैं कुली
स्टेशनों पर दिन-रात मेहनत करने वाले कुलियों का कहना है कि तकनीकी बदलावों ने उनके काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है. पहले यात्री भारी सामान के साथ ट्रेन से उतरते ही कुलियों को आवाज देते थे, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. स्टेशन के हर प्लेटफॉर्म पर लिफ्ट और एस्केलेटर लग जाने के कारण लोग अपना सामान खुद ही ले जाना पसंद करते हैं.
एक स्थानीय स्टेशन पर काम करने वाले वरिष्ठ कुली ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया, "अब यात्री हमारे पास सामान उठवाने के लिए नहीं आते. वे केवल हमसे यह पूछने आते हैं कि अमुक ट्रेन किस प्लेटफॉर्म पर आएगी या लिफ्ट किस तरफ है. हम अब सिर्फ बिना वेतन के 'पूछताछ केंद्र' बनकर रह गए हैं."
दैनिक आय में भारी गिरावट, परिवार चलाना हुआ मुश्किल
यात्रियों की आत्मनिर्भरता और स्टेशनों पर व्हीलचेयर व मुफ्त ट्रॉली की उपलब्धता के कारण कुलियों की दैनिक कमाई पर सीधा असर पड़ा है. कुछ साल पहले तक जो कुली रोजाना 800 से 1,000 रुपये तक कमा लेते थे, आज उनकी कमाई घटकर 200 से 300 रुपये के बीच सिमट गई है.
इस नाममात्र की आय में से उन्हें रेलवे को अपना लाइसेंस शुल्क भी देना पड़ता है. महंगाई के इस दौर में इतनी कम कमाई से बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन और बुजुर्गों की दवाई का खर्च उठाना कुलियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.
रेलवे से ग्रुप-डी में समायोजन की पुरानी मांग फिर पकड़ी जोर
इस आर्थिक तंगी और अनिश्चित भविष्य को देखते हुए देश के विभिन्न रेलवे स्टेशनों के कुली संघों ने एक बार फिर सरकार के सामने अपनी पुरानी मांग दोहराई है. कुलियों की मांग है कि साल 2008 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल की तर्ज पर, वर्तमान सरकार भी उन्हें वन-टाइम सेटलमेंट के तहत रेलवे के ग्रुप-डी पदों पर समायोजित करे.
कुलियों का तर्क है कि वे सालों से रेलवे तंत्र का हिस्सा रहे हैं और स्टेशन की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह समझते हैं. ऐसे में उन्हें गैंगमैन, चपरासी या ट्रैकमैन जैसे पदों पर नियुक्त कर एक स्थायी रोजगार दिया जाना चाहिए, जिससे उनका भविष्य सुरक्षित हो सके.
बदलती तकनीक और मानवीय पहलू का टकराव
रेलवे अधिकारियों का मानना है कि विश्वस्तरीय स्टेशन बनाने और बुजुर्गों व दिव्यांग यात्रियों की सुविधा के लिए लिफ्ट और एस्केलेटर लगाना समय की मांग है. हालांकि, इस तकनीकी विकास का दूसरा पहलू यह है कि इससे असंगठित क्षेत्र के इस पारंपरिक वर्ग के सामने पहचान और अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को स्टेशनों के आधुनिकीकरण के साथ-साथ कुलियों के पुनर्वास या उन्हें स्टेशन प्रबंधन के अन्य वैकल्पिक कार्यों (जैसे पार्सल हैंडलिंग या सुरक्षा सहायता) में शामिल करने की योजना पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.