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राजस्थान हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: साइबर अपराध के आरोपी पर लगाया 3 साल का सोशल मीडिया बैन; खुद या फर्जी नाम से चलाया अकाउंट, तो रद्द होगी जमानत

डिजिटल उत्पीड़न (साइबर हैरेसमेंट) पर लगाम लगाने के लिए राजस्थान हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने एक नाबालिग लड़की की मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ की गई) तस्वीर प्रसारित करने के आरोपी को इस कड़ी शर्त पर जमानत दी है कि वह अगले तीन साल तक किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा.

राजस्थान हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: साइबर अपराध के आरोपी पर लगाया 3 साल का सोशल मीडिया बैन; खुद या फर्जी नाम से चलाया अकाउंट, तो रद्द होगी जमानत
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: Pexels)

जयपुर: डिजिटल स्पेस में महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर देश की न्यायपालिका अब कड़े और लीक से हटकर कदम उठा रही है. राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) ने साइबर उत्पीड़न और डिजिटल अपराधों (Cyber ​​Harassment and Digital Crimes) पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से एक अभूतपूर्व फैसला सुनाया है. अदालत ने एक आरोपी को जमानत देते हुए उसके अगले तीन साल तक किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है. यह आदेश न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने उस आरोपी की जमानत याचिका मंजूर करते हुए जारी किया, जिसे एक नाबालिग लड़की की मॉर्फ्ड (संपादित/छेड़छाड़ की गई) तस्वीर इंटरनेट पर प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. यह भी पढ़ें: इनकम टैक्स छूट पर बॉम्बे हाई कोर्ट में सुनवाई: कानूनी मान्यता के बिना समलैंगिक जोड़ों को नहीं मिल सकता 'पति-पत्नी' वाला टैक्स लाभ

खुद का नाम हो या फर्जी आईडी; पकड़े गए तो वापस जाना होगा जेल

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि आरोपी ने पूर्व में डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग किया है, इसलिए भविष्य में ऐसे अपराधों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कड़े सुधारात्मक उपाय आवश्यक हैं. अदालत ने आदेश जारी करते हुए कहा:

"आरोपी को ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) के समक्ष एक हलफनामा/अंडरटेकिंग (शपथ पत्र) प्रस्तुत करना होगा कि वह अगले तीन वर्षों की अवधि के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, थ्रेड्स, स्नैपचैट आदि सहित किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग नहीं करेगा. यदि यह पाया जाता है कि आरोपी अपने असली नाम या किसी भी फर्जी (फिक्टिशस) नाम से किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहा है, तो ट्रायल कोर्ट को उसकी जमानत तत्काल रद्द करने का पूरा अधिकार होगा."

मामले का कानूनी संदर्भ और पृष्ठभूमि

इस मामले के घटनाक्रम के अनुसार, पीड़ित पक्ष की शिकायत पर आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 77 के तहत 'दृश्यरतिकता' (Voyeurism/दूसरों की निजी तस्वीरों को उनकी मर्जी के बिना देखना या प्रसारित करना) का मामला दर्ज किया गया था. पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया था.

सुनवाई के दौरान आरोपी के बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि उसे इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है और वह अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही जेल में है. बहस के दौरान वकील ने अदालत के सामने खुद यह प्रस्ताव भी रखा कि यदि माननीय अदालत उचित समझे, तो उनका मुवक्किल सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाने के लिए तैयार है. अदालत ने पाया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है, आरोपी काफी समय से हिरासत में है और अदालती सुनवाई (ट्रायल) पूरी होने में लंबा वक्त लग सकता है. इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी की जमानत मंजूर कर ली, लेकिन साथ ही डिजिटल गतिविधियों पर तीन साल का कड़ा प्रतिबंध मढ़ दिया.

भारतीय अदालतों में बढ़ता 'डिजिटल पाबंदी' का ट्रेंड

राजस्थान हाई कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका में आ रहे एक बड़े बदलाव और नए ट्रेंड को दर्शाता है. हाल के दिनों में देश की विभिन्न अदालतों द्वारा साइबर स्टॉकिंग (इंटरनेट पर पीछा करना), अश्लील सामग्री के प्रसार, ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग या नाबालिगों के उत्पीड़न से जुड़े मामलों में आरोपियों को जमानत देने के लिए 'डिजिटल प्रतिबंधों' को एक मुख्य शर्त के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की पाबंदियों से न केवल पीड़ितों को मानसिक शांति मिलती है और वे आगे होने वाले डिजिटल उत्पीड़न से सुरक्षित रहते हैं, बल्कि यह समाज में इंटरनेट के गलत इस्तेमाल को लेकर एक मजबूत संदेश भी देता है.

 

(The above story first appeared on LatestLY on Jul 09, 2026 04:53 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).