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Gadchiroli: माओवादियों ने पिता को मारा, बेटी डॉक्टर ने हड्डी के ट्यूमर की दी मात, अब कर रही आदिवासियों की सेवा

डॉ भारती और डॉ. तिलंकर की 'इच्छा' है और उन्होंने बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के साथ लगभग एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों की मांग की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पूरी आदिवासी आबादी स्वस्थ रहे और उन्हें दूर शहरों में जाने की जरूत न पड़े, लेकिन शायद की कोई व्यक्ति उपलब्ध हो जो चुनौतियों का सामने करने को तैयार हो.

Gadchiroli: माओवादियों ने पिता को मारा, बेटी डॉक्टर ने हड्डी के ट्यूमर की दी मात, अब कर रही आदिवासियों की सेवा
गढ़चिरौली (Photo Credits: Twitter)

गढ़चिरौली: साल 2002 में एक 17 वर्षीय भारती एम बोगामी (Bharti M Bogami) ने अपनी दुनिया को उस समय ढहते हुए महसूस किया, जब उसके पिता मालू कोपा बोगामी (Malu Kopa Bogami) को माओवादियों (Maoists) ने गोलियों से छलनी कर दिया गया था. माओवादियों ने भारती की महत्वपूर्ण एचएससी विज्ञान परीक्षा (HSC Science Exam) से एक दिन पहले इस घटना को उसके गांव लहेरी में अंजाम दिया था. कोपा बोगामी कांग्रेस (Congress) पार्टी के नेता थे.

अचानक पारिवारिक त्रासदी से स्तब्ध भारती ने महान मुरलीधर देवीदास आमटे उर्फ बाबा आमटे की सलाह 'अतीत के अनुभवों से सीखो और भविष्य को देखो' को याद करते हुए सफल होने के लिए अपनी परीक्षा दी. आज, वह साहसी लड़की बीएएमएस स्नातक है. 39 वर्षीय डॉ भारती बोगामी की शादी 40 वर्षीय डॉ. सतीश तिरंकर से हुई है. दोनों पति पत्नी अब एक 'मसीहा' हैं जो हजारों आदिवासियों की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं. पीटी उषा आईओए अध्यक्ष के रूप में अधिक सुधार लाने और पारदर्शी शासन शुरू करने में कामयाब होगी?

कई त्रासदियों का सामना करते हुए डॉ भारती ने कहा कि उनके पिता की जघन्य हत्या के बमुश्किल दो साल बाद, उनकी मां मदनी को 2004 में फेशियल (चेहरे) पैरालिसिस हो गया था. डॉ भारती ने आईएएनएस को बताया, स्थानीय लोगों और पुलिस ने उन्हें दूर के एक अस्पताल में भर्ती कराया. मैं पुणे में थी और मेरी 2 बहनें और भाई किसी तरह उनकी देखभाल के लिए अस्पताल पहुंचे.

पुणे के भारतीय संस्कृति दर्शन ट्रस्ट (बीएसडीटी) आयुर्वेद कॉलेज में पढ़ने वाली भारती को हड्डी का ट्यूमर हो गया था, उन्होंने दो साल तक संघर्ष किया और अपनी पढ़ाई पर अड़ी रहीं. भारती ने कहा कि मैं बीएसडीटी अधिकारियों, मेरे सहपाठियों और सहयाद्री अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा मेरी चिकित्सा परीक्षा के दौरान दी गई सहायता और वित्तीय सहायता को नहीं भूल सकती.

डॉ भारती ने कहा कि बाबा आमटे, उनके बेटे डॉक्टर प्रकाश आमटे और पत्नी डॉक्टर मंदाकिनी की प्रेरणा से मुझे हड्डी के ट्यूमर पर पूरी तरह से काबू पाने में मदद मिली. संयोग से, वह आदिवासी सरकारी आश्रम स्कूल लाहेरी में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद बहुत पहले आमटे परिवार के संपर्क में आ गई थीं. उन्हें अपने घर से करीब 70 किलोमीटर दूर बोडिर्ंग संस्थान हेमलकसा में प्रसिद्ध 'लोक बिरादरी प्रकल्प आश्रम शाला' में भर्ती कराया गया.

2010-2011 में एक मेडिकल डिग्री के साथ गौरवान्वित डॉ भारती ने मुंबई पुणे या नागपुर जैसे बड़े शहरों में काम करने के ग्लैमर को त्याग दिया और गढ़चिरौली के लिए एक घर वापसी को प्राथमिकता दी. वह प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से सबसे अधिक भूले हुए क्षेत्रों में आदिवासियों के सबसे गरीब लोगों की अस्वाभाविक सेवा में जुट गईं.

उसने कुछ समय के लिए एक छोटी सी निजी प्रैक्टिस की और बाद में उन्हें भामरागढ़ और एतापाली में दो आश्रम शालाएं सौंपी गईं, और 2015 में वहां के सभी जिला परिषद स्कूलों में सभी छात्रों के स्वास्थ्य की निगरानी करने का काम सौंपा गया. डॉ तिरंकर ने कहा, यहां के 52 गांवों में 18,000 से अधिक लोग हैं, सभी प्रकार के बड़े और छोटे मुद्दों के साथ हम उनकी सलाह लेते हैं या उनका इलाज करते हैं या उन्हें चंद्रपुर, नागपुर आदि के अन्य अस्पतालों में रेफर करते हैं.

डॉ भारती और डॉ. तिरंकर (एमबीबीएस) ने 2018 में अरेंज मैरिज की थी. दंपति का एक बेटा भी है. दंपति बिना आराम या शिकायत के काम करते हैं. डॉ तिरंकर ने कहा कि डॉ भारती का कहना है कि वह समाज को कुछ लौटाना चाहती हैं जिसने हमें इतना कुछ दिया है. उन्होंने कहा कि वह पहले, डॉ तिरंकर नंदुरबार और अहमदनगर में पोस्टिंग के साथ बीड में काम करते थे, लेकिन शादी के बाद उन्होंने गढ़चिरौली में स्थानांतरण ले लिया. यहां स्थानीय लोगों के साथ वह बेहद खुश हैं और यहां तक कि उनकी मां भी अक्सर उनसे मिलने जाना पसंद करती हैं.

डॉ तिरंकर ने कहा कि आदिवासी जिन सबसे बुरी समस्याओं से जूझ रहे हैं उनमें मलेरिया, सांप के काटने या बिच्छू के डंक के बड़े पैमाने पर मामले हैं. पहाड़ी जंगली इलाकों में अन्य छोटी या गंभीर चिकित्सा समस्याएं हैं, जहां सड़क नेटवर्क बहुत कम है या नहीं है. स्थिति इतनी खराब है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए आदिवासी लंबी दूरी तय करते हैं, कई बार 4-5 घंटे पैदल चलते हैं.

डॉ भारती और डॉ. तिलंकर की 'इच्छा' है और उन्होंने बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के साथ लगभग एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों की मांग की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पूरी आदिवासी आबादी स्वस्थ रहे और उन्हें दूर शहरों में जाने की जरूत न पड़े, लेकिन शायद की कोई व्यक्ति उपलब्ध हो जो चुनौतियों का सामने करने को तैयार हो.

(The above story first appeared on LatestLY on Jan 29, 2023 05:31 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).