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कल्पना से कारोबार तक: लखनऊ की दो बहनों ने कैसे रची एक नई दुनिया

लखनऊ की दो बहनों ने भारतीय कला और संस्कृति से प्रेरित एक कार्ड गेम बनाया जिसे 40 से ज्यादा देशों के लोगों ने पसंद किया.

कल्पना से कारोबार तक: लखनऊ की दो बहनों ने कैसे रची एक नई दुनिया
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

लखनऊ की दो बहनों ने भारतीय कला और संस्कृति से प्रेरित एक कार्ड गेम बनाया जिसे 40 से ज्यादा देशों के लोगों ने पसंद किया. उनकी कहानी बताती है कि संस्कृति केवल विरासत नहीं बल्कि रचनात्मक उद्यम का जरिया भी बन सकती है.लखनऊ में मृणालिनी मित्रा का मल्टीमीडिया नैरेटिव स्टूडियो मित्रासा यूं तो किसी आम स्टूडियो जैसा दिखता है लेकिन भीतर का दृश्य कुछ अलग है. भीतर रखी मेज पर फैले दर्जनों रंग-बिरंगे कार्ड बताते हैं कि यहां सिर्फ एक गेम नहीं, बल्कि एक पूरी काल्पनिक दुनिया रची जा रही है.

इन कार्डों में ना बादशाह हैं, ना बेगम हैं और ना इक्का. इनमें ऐसे पात्र हैं जो किसी वास्तविक इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि भारतीय कला और सांस्कृतिक कल्पना से जन्मी एक नई दुनिया के निवासी हैं.

इस कार्ड गेम के जरिए मृणालिनी मित्रा भारतीय कला, संस्कृति और लोक परंपराओं से जुड़ी कहानियों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं. उनका मानना है कि भारत की कहानियां सिर्फ किताबों और फिल्मों में नहीं बल्कि खेलों के जरिए भी दुनिया तक पहुंच सकती हैं.

इतिहास, कला और संस्कृति को आमतौर पर संग्रहालयों, स्मारकों और किताबों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन मृणालिनी मित्रा और उनकी बहन न्योनिका ने उन्हीं स्मृतियों को एक ऐसे कार्ड गेम का हिस्सा बन दिया है जिसे दोस्त और परिवार के लोग साथ बैठकर खेल सकते हैं. मृणालिनी मित्रा कहती हैं, "कला और संस्कृति जैसी चीजें सिर्फ किताबों में कैद रहने वाली, पढ़ी या देखी जाने वाली चीजें नहीं हैं बल्कि उन्हें खेल का हिस्सा बनाकर महसूस भी किया जा सकता है.”

कार्ड गेम को मिली वैश्विक पहचान

मृणालिनी मित्रा और उनकी बहन न्योनिका के इस कार्ड गेम को इसी साल जून में दुनिया के 40 से ज्यादा देशों के लोगों ने क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म किकस्टार्टर पर हाथों-हाथ लिया और एक महीने के भीतर उनके इस अभियान को एक लाख अमेरिकी डॉलर से भी ज्यादा का फंड मिल गया.

मृणालिनी कहती हैं कि इस स्टार्टअप के पीछे सबसे बड़ा मकसद यह था कि अपनी सांस्कृतिक विरासत, कल्पनाशीलता और कला को वैश्विक बाजार में एक क्रिएटिव प्रोडक्ट के रूप में पेश किया जाए.

ऑनलाइन गेमिंग को क्यों नहीं समझना चाहिए बच्चों का खेल

इस गेम की नायिका अमाया है, जो मृणालिनी की काल्पनिक दुनिया 'वर्ल्ड ऑफ मित्रासा' की एक 'क्लाउड मास्टर' है. यानी वह इस फैंटेसी संसार की एक काल्पनिक पात्र है.

‘वन मोर पेज' नाम के अपने इस गेम के बारे में मृणालिनी बताती हैं, "गेम की कहानी अमाया नाम की एक लेखिका के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी किताब पूरी करने की कोशिश कर रही है. लेकिन उसकी सबसे बड़ी चुनौती है उसकी एक पालतू गाय बो, जिसे जगाए बिना उसे अपना काम पूरा करना है.”

वो आगे बताती हैं, "इस गेम में एक से लेकर छह तक प्लेयर हो सकते हैं. यह गेम करीब आधे घंटे का होता है. खिलाड़ी एक मायावी दुनिया में जूनियर लेखक बनते हैं. कार्ड किताब के पन्नों सरीखे होते हैं. खिलाड़ी एक-एक करके कार्ड पलटते हैं, यानी अपनी किताब के नए पन्ने लिखते हैं. लेकिन यदि एक कार्ड दोबारा आ गया, तो बो जाग जाती है और खिलाड़ी की अब तक की मेहनत दूसरे खिलाड़ियों में बंट जाती है. नौ अध्याय पूरे करने वाला विजेता बन जाता है.”

गेम के नियम इस तरह बनाए गए हैं कि हर बार खिलाड़ी के सामने वही दुविधा आती है जिसका सामना कोई लेखक करता है यानी क्या एक पन्ना और लिखा जाए या फिर यहीं रुककर अब तक की मेहनत बचा ली जाए.

मृणालिनी बताती हैं कि गेम की दुनिया भले ही काल्पनिक हो, लेकिन उसकी भावनाएं हर उस व्यक्ति की हैं जिसने कभी घर से काम करते हुए अपने पालतू जानवर की शरारतों का सामना किया हो.

गेम का मकसद

इस गेम की कहानी यहीं खत्म नहीं होती बल्कि इसका मकसद कहीं बड़ा है. मृणालिनी ने इसे सिर्फ एक कार्ड गेम नहीं बनाया बल्कि ‘मित्रासा की दुनिया' नाम से एक पूरा कल्पनालोक तैयार किया है जिसकी जड़ें दक्षिण एशियाई कला, प्रकृति और सांस्कृतिक सौंदर्यबोध में हैं. कुछ उसी तरह, जैसे जापान ने पोकेमॉन और स्टूडियो घिबली के जरिए अपनी कल्पनाशील दुनिया रची और ब्रिटिश लेखक जेआरआर टॉल्किन ने मिडिल अर्थ जैसा काल्पनिक संसार बनाया.

मृणालिनी के इस गेम की दुनिया में बो के पास पड़े मोदक यानी लड्डू दिखते हैं, चित्रों में जामुन के फल हैं, कचनार के फूल हैं. इसके अलावा इनमें मौजूद विविध रंग, आकृतियां और दृश्य भारतीय उपमहाद्वीप की प्रकृतिक संरचना और कला परंपरा से प्रेरित हैं. दिलचस्प बात यह है कि गेम खेलने वाले इन सांस्कृतिक संकेतों को बिना किसी मदद के समझ जाते हैं.

मृणालिनी बताती हैं, "हम चाहते हैं कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को सिर्फ किताबों के जरिए ना जाना जाए बल्कि उसे खेलते-खेलते महसूस किया जाए. हम यह दावा नहीं करते कि हम इतिहास और संस्कृति को पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हां, हमारा यह प्रयास है कि इन चीजों को गेमिंग जैसे मजेदार तरीके से भी सीखा और समझा जा सकता है.”

मृणालिनी कहती हैं कि ‘वन मोर पेज' सीधे इतिहास और संस्कृति का गेम नहीं है बल्कि यह दक्षिण एशियाई कला, सौंदर्यबोध, प्रकृति और सांस्कृतिक प्रतीकों से प्रेरित एक मौलिक कल्पना है.

दुनिया भर में वीडियो गेम, बोर्ड गेम और कार्ड गेम अब सिर्फ मनोरंजन के माध्यम नहीं रह गए हैं बल्कि वे इतिहास, मिथकों, लोककथाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को नए रूप में प्रस्तुत करने का माध्यम भी बन रहे हैं. मृणालिनी का प्रयास भी कुछ इसी दिशा में है. उनका मानना है कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए जो काम किताबें और लंबे व्याख्यान कर सकते हैं, कभी-कभी एक अच्छा खेल भी वही काम कर सकता है.

कैसे आया ये विचार?

अपनी इस रचनात्मक यात्रा के पीछे मृणालिनी मित्रा उन भावुक पलों का जिक्र करती हैं जब उनकी मां को स्टेज-3 के कैंसर का पता चला. वो बताती हैं, "तब मुझे महसूस हुआ कि कल्पना केवल कला का माध्यम नहीं है बल्कि यह मुश्किल समय में इंसान को संभालने वाली ताकत भी हो सकती है.”

मृणालिनी कहती हैं कि लंबे समय तक उन्हें लगता था कि उनके भीतर दो अलग-अलग दुनिया रहती हैं. एक तरफ वो चित्रकार थीं तो दूसरी तरफ लेखिका. जैसे एक ही व्यक्ति के भीतर दो अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग हों. वो कहती हैं, "उसी दौर में मुझे लगा कि यदि कल्पना इंसान को कठिन समय में संभाल सकती है, तो शायद वही दूसरों तक उम्मीद और खुशी भी पहुंचा सकती है. इसी सोच ने मित्रासा की नींव रखी.”

बोर्ड गेम का फैलता संसार

बोर्ड गेम का उद्योग दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है. पिछले डेढ़ दशक में ऐसे गेम्स की लोकप्रियता बढ़ी है जो केवल मनोरंजन ही नहीं करते, बल्कि खेलने वालों को किसी संस्कृति, सभ्यता या ऐतिहासिक दौर का अनुभव भी कराते हैं.

दिल्ली में गेमिंग के व्यवसाय से जुड़े दिनकर शर्मा कहते हैं, "दुनिया भर में इस तरह के गेम पिछले कुछ समय से काफी पॉपुलर हैं लेकिन भारत में कम हैं. यूरोप में मध्यकालीन व्यापार पर आधारित गेम हैं, जापान की लोक परंपराओं पर आधारित गेम हैं, कई दूसरे देशों में स्थानीय मिथकों से प्रेरित गेम हैं. लेकिन भारत में जिसके पास हजारों वर्षों का इतिहास और सांस्कृतिक विविधता है, वहां ऐसे गेम बहुत कम दिखाई देते हैं.”

दिनकर शर्मा कहते हैं, "किसी कार्ड गेम को विकसित करना सिर्फ खूबसूरत चित्र बनाने का काम नहीं है बल्कि हर नियम को बार-बार परखा जाता है, सैकड़ों बार खेला जाता है, गलतियों को सुधारा जाता है. और फिर तय किया जाता है कि खिलाड़ी पूरे खेल के दौरान उत्साहित बना रहेगा या नहीं. किसी अच्छे बोर्ड गेम की सफलता केवल उसके विषय पर नहीं, बल्कि उसके गेम मेकैनिक्स पर निर्भर करती है.”

किकस्टार्टर के जरिए मिले क्राउड फंडिंग को लेकर मृणालिनी कहती हैं कि यह सिर्फ किसी प्रोडक्ट को खरीदने के लिए पैसे नहीं देते बल्कि वे किसी विचार, किसी कलाकार और उसकी कल्पनाशीलता पर भरोसा जताते हैं. दरअसल, किकस्टार्टर पर मिलने वाले पैसे का मतलब है कि वो आपके स्टार्टअप पर भरोसा कर रहे हैं और उसके उत्पाद को खरीदने के लिए वो पहले ही ऑर्डर कर रहे हैं.

क्या है क्राउडफंडिंग?

दरअसल, क्राउडफंडिंग का मॉडल पारंपरिक निवेश से अलग होता है. इसमें लोग किसी बने-बनाए प्रोडक्ट को नहीं खरीदते, बल्कि उसके बनने से पहले ही प्री-ऑर्डर करते हैं. इससे स्टार्टअप को अपने प्रोडक्ट के लिए शुरुआती पूंजी मिल जाती है और प्रोडक्ट तैयार होने पर सबसे पहले उनके पास वो चीज पहुंच जाती है.

मृणालिनी बताती हैं, "हमें 40 से ज्यादा देशों के लोगों का समर्थन मिला, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा जैसे देशों के लोग भी शामिल हैं. इसके जरिए हमें सिर्फ आर्थिक मदद ही नहीं मिली, बल्कि सबसे बड़ी बात यह है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लोगों ने भारतीय सांस्कृतिक सौंदर्यबोध पर आधारित एक नए कल्पनालोक में अपनी दिलचस्पी दिखाई.”

एआई यानी आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस के दौर में मित्रासा स्टूडियो ने एक और अलग रास्ता चुना है. मृणालिनी कहती हैं कि उनके स्टूडियो में हर चित्र, हर कार्ड और हर अक्षर उन्होंने या फिर उनके साथियों ने खुद तैयार किया है, किसी तरह के एआई जैसे टूल का इस्तेमाल नहीं किया है. वो कहती हैं, "तकनीक उपयोगी हो सकती है, लेकिन कल्पना और क्रिएटिविटी का केंद्र इंसान ही होना चाहिए. जब दुनिया कृत्रिम रूप से बनाई गई कला से भर रही है, तब हाथ से बनी कला की अपनी अलग पहचान और कीमत है.”

बहरहाल, 'वन मोर पेज' वैश्विक बोर्ड गेम उद्योग में कितनी बड़ी जगह बना पाएगा, यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन लखनऊ के एक छोटे-से स्टूडियो ने इतना जरूर दिखा दिया है कि भारतीय कला, संस्कृति और कल्पनाशीलता केवल अतीत की विरासत नहीं हैं बल्कि वे भविष्य के रचनात्मक उद्योगों का आधार भी बन सकती हैं.

(The above story first appeared on LatestLY on Jul 09, 2026 07:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).