सरकार का बड़ा फैसला: गुरुकुल छात्रों को मिलेगा IIT में मौका, 65000 रुपये तक की फेलोशिप भी

Setubandh Scholar Scheme: अब गुरुकुल में पढ़े छात्रों को बिना डिग्री भी आईआईटी जैसे संस्थानों में रिसर्च करने और स्कॉलरशिप पाने का मौका मिलेगा. ‘सेतुबंध विद्वान योजना’ पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

(Photo Credits ANI)

Setubandh Scholar Scheme: सरकार ने अब एक नई पहल शुरू की है, जिससे गुरुकुल जैसी पारंपरिक पढ़ाई करने वाले छात्रों को भी देश के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों, जैसे कि आईआईटी (IIT) में रिसर्च करने का मौका मिल सकेगा. खास बात यह है, कि इसके लिए अब उन्हें किसी स्कूल या कॉलेज की डिग्री की जरूरत नहीं होगी. यानी अगर कोई छात्र वर्षों तक गुरुकुल में रहकर वेद (Vedas), संस्कृत (Sanskrit), आयुर्वेद (Ayurveda), ज्योतिष (Astrology) या दर्शन (Philosophy) जैसे पारंपरिक विषयों की गहराई से पढ़ाई करता है, और उसमें अच्छा ज्ञान रखता है, तो अब वह भी आधुनिक रिसर्च संस्थानों में जाकर अपना योगदान दे सकता है.

क्या है ‘सेतुबंध विद्वान योजना’?

‘सेतुबंध विद्वान योजना’ (Setubandha Vidwan Yojana) सरकार की एक नई योजना है, जिसका उद्देश्य भारत की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली जैसे वेद, आयुर्वेद, दर्शन, ज्योतिष आदि को आधुनिक रिसर्च और विज्ञान से जोड़ना है. इस योजना के तहत अब ऐसे छात्र जिन्होंने गुरुकुल में पढ़ाई की है, वह भी आईआईटी जैसे देश के बड़े रिसर्च संस्थानों में फेलोशिप (Fellowship) प्राप्त कर सकेंगे और वहां रिसर्च कर सकेंगे. यह पहल पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी से जोड़ने और उसे सम्मान देने का एक महत्वपूर्ण कदम है.

किसे मिलेगा इसका फायदा?

इस योजना का फायदा उन छात्रों को मिलेगा जिन्होंने पारंपरिक गुरुकुल प्रणाली के तहत कम से कम 5 साल तक पढ़ाई की हो. ऐसे छात्र जिनके पास संस्कृत, आयुर्वेद, दर्शन, गणित, ज्योतिष या संगीत जैसे भारतीय पारंपरिक विषयों का गहरा ज्ञान है, वह इस योजना के लिए पात्र होंगे. इस योजना की खास बात यह है, कि इसके लिए किसी भी स्कूल या कॉलेज की डिग्री होना जरूरी नहीं है. यानी अब सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुभव को भी महत्व दिया जाएगा.

कितनी मिलेगी स्कॉलरशिप?

इस योजना के तहत दो तरह की स्कॉलरशिप यानी फेलोशिप दी जाएंगी, जो छात्र की योग्यता और रिसर्च स्तर के आधार पर तय होंगी. अगर कोई छात्र पोस्टग्रेजुएट स्तर (Postgraduate Level) पर रिसर्च करता है, तो उसे हर महीने 40,000 रुपये की फेलोशिप मिलेगी और सालाना 1 लाख रुपये रिसर्च खर्चों के लिए दिए जाएंगे. वहीं, अगर कोई छात्र पीएचडी स्तर (PhD Level) पर रिसर्च करता है, तो उसे हर महीने 65,000 रुपये की फेलोशिप और सालाना 2 लाख रुपये रिसर्च ग्रांट के रूप में मिलेंगे. यह आर्थिक सहायता इन विद्वानों को अपने शोध कार्य को बिना किसी वित्तीय परेशानी के आगे बढ़ाने में मदद करेगी.

किन-किन विषयों में कर सकते हैं रिसर्च?

इस योजना के तहत छात्र कई पारंपरिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में रिसर्च कर सकते हैं. इनमें आयुर्वेद और हेल्थ साइंस (Health Science) को भैषज्य विद्या (Pharmaceutics) के नाम से जाना जाता है, जिसमें प्राकृतिक तरीकों से इलाज और जीवनशैली पर अध्ययन किया जाता है. इसके अलावा गणित (Mathematics), खगोलशास्त्र (Astronomy) और भौतिक विज्ञान (Physics) जैसे विषय गणित-भौतिक-ज्योतिष (Mathematical-Physical-Astrology) विद्या के अंतर्गत आते हैं.

दर्शन (Philosophy) और ज्ञान-विज्ञान (Epistemology) से जुड़े विषयों को आन्विक्षिकी विद्या (Investigative Science) कहा जाता है, जहां तर्क, सोच और जीवन के गहरे सवालों पर शोध किया जाता है. इसके साथ ही संस्कृत व्याकरण (Sanskrit Grammar), संगीत (Music), राजनीति (Politics) और कला (Art) जैसे पारंपरिक और सांस्कृतिक विषयों में भी रिसर्च की जा सकती है. यह सभी विषय भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

यह योजना क्यों खास है?

यह पहली बार है, जब सरकार ने गुरुकुल में पढ़े-लिखे विद्वानों के पारंपरिक ज्ञान को इतनी बड़ी अहमियत दी है. अब तक ऐसे लोग सिर्फ मंदिरों, आश्रमों या पारंपरिक संस्थानों तक ही सीमित रहते थे, लेकिन अब उन्हें भी आईआईटी जैसे आधुनिक और बड़े रिसर्च संस्थानों में शोध करने का मौका मिलेगा. इससे यह साबित होता है, कि अब ज्ञान का मूल्य सिर्फ डिग्री से नहीं, बल्कि गहराई से समझे गए विषयों से तय होगा.

यह योजना किसके तहत शुरू हुई?

सेतुबंध विद्वान योजना को केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया है. इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी (Central Sanskrit University) के अंतर्गत आने वाले भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) विभाग को दी गई है. यह पूरी पहल भारत की नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत लाई गई है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक भारतीय ज्ञान को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में शामिल करना और छात्रों को उनकी जड़ों से जोड़ते हुए वैश्विक स्तर पर तैयार करना है.

नई शिक्षा नीति 2020 के बदलाव

नई शिक्षा नीति 2020 के आने के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं. अब बच्चों की पढ़ाई उनकी मातृभाषा में कराई जा रही है, जिससे वह बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं. पढ़ाई को बोझिल बनाने की बजाय इसमें खेल और रचनात्मक गतिविधियों को शामिल किया गया है, जिससे सीखना अब मजेदार हो गया है.

लड़कियों की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है और पीएचडी करने वाली लड़कियों की संख्या पहले की तुलना में दोगुनी हो गई है. इसके साथ ही देशभर में 14,500 से ज्यादा पीएम श्री स्कूल तैयार हो रहे हैं, जो आधुनिक सुविधाओं से युक्त होंगे. डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए दीक्षा (DIKSHA), स्वयं (SWAYAM) जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म शुरू किए गए हैं, जिनसे अब तक 5 करोड़ से ज्यादा छात्र जुड़ चुके हैं. यह सारे बदलाव भारत की शिक्षा व्यवस्था को ज्यादा सुलभ और भविष्य के लिए तैयार बना रहे हैं.

क्यों जरूरी है यह योजना?

भारत में सदियों से वैदिक और शास्त्रीय ज्ञान की समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन समय के साथ आधुनिक शिक्षा प्रणाली में इस पारंपरिक ज्ञान को वह महत्व नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार थी. अब सरकार ने ऐसा कदम उठाया है, जिससे इन पारंपरिक विद्वानों को न सिर्फ सम्मान मिलेगा, बल्कि उनके ज्ञान को आगे बढ़ाने और देश की प्रगति में योगदान देने का अवसर भी मिलेगा.

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