सुधार के बावजूद टीबी को जड़ से मिटाने के लक्ष्य से चूका भारत
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दुनिया की सबसे जानलेवा संक्रामक बीमारी टीबी के एक चौथाई मामले आज भी केवल भारत में सामने आते हैं. पहले भारत सरकार ने 2025 तक टीबी को मिटाने का लक्ष्य रखा था, जिसे अब 2027 तक बढ़ाया गया.विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत में 2015 के बाद से टीबी के नए मामलों में 21 फीसदी की कमी दर्ज हुई है. वहीं, इसी अवधि में इस जानलेवा संक्रामक बीमारी से मरने वालों की तादाद में 28 फीसदी की कमी आई है.

टीबी, तपेदिक या क्षय रोग एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज और रोकथाम पूरी तरह संभव है. यह बैक्टीरिया से होती है और ज्यादातर फेफड़ों को प्रभावित करती है. यह बीमारी हवा के जरिए फैलती है, जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता, छींकता या थूकता है.

2024 में दुनिया भर में कुल 1.07 करोड़ लोग टीबी से बीमार हुए. जिनमें 58 लाख पुरुष, 37 लाख महिलाएं और 12 लाख बच्चे शामिल हैं. डब्ल्यूएचओ का ही साल-दर-साल सुधार का आंकड़ा देखें तो 2024 में दुनिया भर में टीबी से 12.3 लाख लोगों की मौत हुई, जो उसके एक साल पहले की तुलना में करीब तीन फीसदी की कमी है. इनमें से तीन लाख जानें केवल भारत में गईं यानी टीबी के कारण सबसे ज्यादा मौतें भारत में दर्ज हुईं.

इसी अवधि में टीबी के संक्रमण के मामलों में दुनिया में दो फीसदी की कमी दर्ज हुई. जिसका मतलब हुआ कि बीमारी लगने के बावजूद अब दुनिया भर में पहले से अधिक लोगों की जान बचाई जा रही है. कोविड महामारी के बाद से पहली बार इसमें कमी दिखने को मिली है जो कि एक उत्साहजनक सुधार है.

टीबी के जो पांच सबसे बड़े कारण माने जाते हैं, वो हैं कुपोषण, एचआईवी संक्रमण, डायबिटीज, सिगरेट और शराब पीना. खासकर एचआईवी संक्रमित लोगों में टीबी सबसे ज्यादा जानलेवा बीमारी है. 2024 में इससे मरने वाले 12 लाख लोगों में से 1.5 लाख लोग इसी श्रेणी में थे.

कुल सरकारी धन का बहुत छोटा हिस्सा सेहत पर खर्च

केवल आठ देशों में दुनिया के दो-तिहाई टीबी संक्रमण के मामले सामने आते हैं. इनमें करीब एक चौथाई हिस्से के साथ भारत सबसे आगे है. इसके बाद इंडोनेशिया, फिलीपींस, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और बांग्लादेश का नंबर आता हैं.

पूरा विश्व जहां स्वास्थ्य के मद में अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का औसतन छह फीसदी खर्च करता है, वहीं भारत में इस पर लंबे समय से एक से डेढ़ प्रतिशत ही खर्च किया जाता रहा है. सन 2000 से 2010 तक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च लगभग 0.9 से 1.1 फीसदी था. 2015 के बाद इसे थोड़ा बढ़ाया गया और यह 1.2 से 1.3 फीसदी तक पहुंचा. कोविड-19 महामारी के दौरान भारत में स्वास्थ्य पर खर्च बढ़कर लगभग 1.5 फीसदी तक पहुंचा था.

भारत को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में आ रही अड़चनें, कैसे पूरा होगा लक्ष्य

भारत ने 2030 के वैश्विक लक्ष्य से पहले 2025 तक ही अपने यहां टीबी उन्मूलन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था. 2018 में भारत सरकार ने अपने लिए यह लक्ष्य तय किया और तबसे राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत कई रणनीतियां अपनाई गई हैं. लेकिन 2025 तक इसके पूरा ना होने के बाद अब भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा ने 2027 तक टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल करने का आह्वान किया.

'टीबी उन्मूलन के प्री-एलीमिनेशन फेज की ओर बढ़ा भारत'

आईसीएमआर की नई टीबी उन्मूलन तकनीकी रिपोर्ट 2025 में भी संकेत मिले हैं कि पिछले कुल सालों में लगातार टीबी के मरीजों की संख्या में कमी आई है. यह दिखाता है कि भारत टीबी उन्मूलन के 'प्री-एलीमिनेशन फेज' की ओर बढ़ रहा है. लेकिन गरीबी और पिछड़ेपन से ग्रसित देश के कई कमजोर जिले अभी भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं.

आईसीएमआर की रिपोर्ट में साफ तौर पर 'पोस्ट-टीबी लंग डिजीज' का जिक्र है. इसमें बताया गया है कि बहुत से मरीज टीबी से ठीक हो जाने के बाद भी लंबे समय तक सांस की समस्या, फेफड़ों की कमजोरी या काम करने की क्षमता में कमी का सामना करते हैं. देश में इस स्थिति की पहचान और प्रबंधन अभी भी कमजोर है जबकि यह लाखों मरीजों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है.

इलाज और वैक्सीन का विकास कहां तक पहुंचा

पूरी दुनिया में 2024 में 83 लाख लोगों की टीबी इलाज से ठीक हो गई. यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है. इलाज की सफलता दर भी साल दर साल 68 फीसदी से बढ़कर 71 फीसदी हो गई. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि समय पर इलाज मिलने के कारण सन 2000 से अब तक 8.3 करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई जा सकी है.

अगस्त 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के अलग अलग हिस्सों में कम से कम 63 डायग्नोस्टिक टेस्ट पर काम चल रहा है. इसके अलावा टीबी की 29 नई दवाएं क्लिनिकल ट्रायल में हैं. बीसीजी वैक्सीन लंबे समय से बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा है, लेकिन पिछले सौ साल में किसी नई टीबी वैक्सीन को लाइसेंस नहीं मिला है और बड़ों के लिए इसका कोई वैक्सीन है ही नहीं. लेकिन इस समय टीबी का टीका विकसित करने के लिए कम से कम 18 विकल्पों का इंसानों पर परीक्षण किया जा रहा है. इनमें से छह काफी एडवांस स्तर पर पहुंच चुके हैं.