गंगा डॉल्फिन को साल 2009 में राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था. इनका शिकार भी प्रतिबंधित है. लेकिन हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो ने इनके संरक्षण पर सवाल खड़े किए हैं.गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन के साथ बिहार में क्रूरता का मामला सामने आया है. इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि इस राष्ट्रीय जलीय जीव के संरक्षण को लेकर किए जा रहे प्रयास कितने कारगर साबित हो रहे. जबकि, इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम,1972 के तहत सर्वोच्च संरक्षण प्राप्त है.
दरअसल, इन दिनों एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें गंगा, गंडक और घाघरा नदियों के संगम वाले सारण जिले में कुछ बच्चे व वयस्क गंगा डॉल्फिन के एक बच्चे को पानी से निकाल कर हवा में लहराते और उसके साथ तस्वीरें लेते दिखाई दे रहे हैं. जबकि, यह एक लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में वर्गीकृत है.
साल 2009 में घोषित किया गया राष्ट्रीय जलीय जीव
गंगा नदी डॉल्फिन मछलियों से भरपूर और अशांत गहरे जल में पनपती है और कम तेज धारा वाले क्षेत्र में निवास करती है. 2009 में इसे राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था. इसका शिकार प्रतिबंधित है. नदियों के इकोसिस्टम को बेहतर बनाने में इस जीव की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है. जैव संकेतक के रूप में नदियों में इनकी उपस्थिति साफ और संतुलित जलीय वातावरण को दर्शाती है.
बिहार के डॉल्फिन मैन के नाम से मशहूर डॉ आर.के. सिन्हा के अनुसार, ‘‘गंगा डॉल्फिन मछली नहीं, बल्कि एक मांसाहारी स्तनपायी जीव है. आम तौर पर यह पांच से आठ फीट की गहराई वाले पानी में निवास करती है. हर 30 से 40 सेकेंड में इसे जल से ऊपर आकर सांस लेनी पड़ती है.''
औसतन इसकी लंबाई दो से ढाई मीटर होती है, जबकि वजन 80 से 90 किलोग्राम होता है. लंबे, नुकीले थूथुन और बड़े फ्लिपर्स वाली यह जीव दृष्टिहीन होती है और दिशा की पहचान के लिए इको लोकेशन (ध्वनि तरंगों) का उपयोग करती है. भोजन के तौर पर यह छोटी मछलियों का शिकार करती है. गंगा नदी इसके लिए सर्वाधिक अनुकूल रही है.
गंगा डॉल्फिन की संख्या में बिहार दूसरे नंबर पर
भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए 15 अगस्त, 2020 को प्रोजेक्ट डॉल्फिन शुरू किया था. वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया और विभिन्न राज्यों के वन विभाग के सहयोग से 2021 से 2023 के बीच आठ राज्यों की 28 नदियों का सर्वे किया गया.
मीठे पानी वाली डॉल्फिन की दो प्रजातियां हैं- गंगा नदी डॉल्फिन और सिंधु नदी डॉल्फिन. विश्व वन्य जीव दिवस के मौके पर 3 मार्च, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नदी डॉल्फिन गणना रिपोर्ट जारी की गई. जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार गंगा डॉल्फिन की संख्या 6324 पायी गई, जबकि सिंधु नदी में यह संख्या महज तीन थी.
सिंधु डॉल्फिन केवल व्यास नदी में पायी गई. वहीं, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 2397, बिहार में 2220 और पश्चिम बंगाल में 815 गंगा डॉल्फिन मिलीं. बिहार की नदियों में गंगा के अलावा गंडक, पुनपुन, कर्मनाशा, कोसी, महानंदा, बागमती और कमला-बलान नदी में डॉल्फिन पायी गईं.
रिपोर्ट के अनुसार, 20वीं सदी के अंत तक गंगा नदी में इसकी संख्या चार से पांच हजार के करीब थी. 1980 से मार्च, 2025 के बीच कम से कम पांच सौ डॉल्फिन की मौत हुई है. हालांकि, अभी भी इनके आवास, प्रजनन स्थल, गतिविधियों और शिकार करने की आदतों को लेकर सीमित जानकारी ही उपलब्ध है.
जल प्रदूषण और जाल सबसे बड़ा दुश्मन
पर्यावरणविद पी.के.दास कहते हैं, ‘‘जहां नदी स्वच्छ होती है, वहीं गंगा डॉल्फिन फलती-फूलती है. मीठे जल में प्राकृतिक तौर पर निवास करने वाली इस जीव को सबसे बड़ा खतरा नदियों के पानी के प्रदूषित होने तथा मछली पकड़ने के लिए लगाए जाने वाले जाल में उलझने से है.'' अगर नदी के पानी में प्लास्टिक कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट या अन्य वजहों से प्रदूषण बढ़ जाता है तो सबसे अधिक डॉल्फिन ही प्रभावित होती है. जाल इनके लिए अक्सर जानलेवा साबित होते हैं.
वन्यजीवों पर शोध करने वाले छात्र संतोष कुमार सिंह कहते हैं, ‘‘नदियों में बढ़ते प्रदूषण के साथ ही जल प्रवाह में कमी भी डॉल्फिन के लिए खतरा है. इससे इनका प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहा है. नाव-स्टीमर और नदियों की ड्रेजिंग से इनका इको लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम प्रभावित होता है.'' वहीं, बांध-बैराज और मानव जनित गतिविधियां भी इनकी घटती आबादी के मुख्य कारणों में शामिल हैं.
किसी भी वजह से छोटी मछलियों की कमी होने से भी डॉल्फिन दूसरी जगह चली जाती हैं. बंसपत्ता मछली, जो इनका मुख्य भोजन माना जाता है, वह भी मछुआरों को दिख नहीं रही. फिर इनके शरीर में 30 प्रतिशत वसा (फैट) पाए जाने के चलते भी इनका शिकार कर लिया जाता है, जिसका उपयोग छोटी-छोटी मछलियों को फंसाने में किया जाता है.
मोटर वाली नावों के प्रोपेलर में फंसने से भी कभी-कभी डॉल्फिन की मौत हो जाती है. प्रोपेलर के ब्लेड ही पानी को पीछे की ओर फेंकते हैं, जिससे नाव या बोट आगे बढ़ती है. 1960 और 1970 के दशक में राजधानी पटना के गंगा घाटों पर हमेशा डॉल्फिन दिख जाती थी, किंतु आज घंटों खड़े रहने के बाद भी इनके दीदार नहीं होते.
वर्ष 2024 के जून माह में भागलपुर जिले के सुल्तानगंज में गंगा नदी पर बना निर्माणाधीन पुल ध्वस्त होकर गिर गया. इस संबंध में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने नदी में गिरे मलबे को डॉल्फिन के जीवन को खतरे में डालने वाला बताते हुए मुकदमा दर्ज किया था. इसी क्षेत्र में विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभ्यारण्य आता है, जिसका विस्तार सुल्तानगंज से कहलगांव तक करीब 60 किलोमीटर के दायरे में है. यह देश का एकमात्र ऐसा अभयारण्य है.
क्या कारगर साबित हो रहे हैं संरक्षण के उपाय
लुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन के संरक्षण हेतु जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से बिहार में पांच अक्टूबर को डॉल्फिन दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस राष्ट्रीय जलीय जीव को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं. पटना विश्वविद्यालय परिसर में गंगा नदी के किनारे भारत का पहला राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र (एनडीआरसी) स्थापित किया गया है, जहां गंगा डॉल्फिन के व्यवहार और संरक्षण पर शोध किया जाता है.
राज्य के भागलपुर जिले में सुल्तानगंज से लेकर कहलगांव के बीच गंगा नदी का करीब 60 किलोमीटर लंबा क्षेत्र विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभ्यारण्य बनाया गया है. यहां अवैध शिकार और मछली पकड़ने वाले जालों पर कड़ी नजर रखी जाती है. भारत सरकार भी प्रोजेक्ट डॉल्फिन नामक परियोजना के तहत बिहार को केंद्र में रखकर इसकी आबादी बढ़ाने तथा उनके आवास परिक्षेत्र को सुरक्षित और प्रदूषण मुक्त बनाने पर काम कर रही है.
इसके अलावा बिहार सरकार वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के सहयोग से इनकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए स्थानीय मछुआरों को जागरूक कर रही है. केंद्र की नमामि गंगे योजना के तहत गंगा नदी में प्रदूषण कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं. ताकि, जैव विविधता कायम रहे और जलीय जीवों की आबादी बढ़ती रहे. गंगा प्रहरी और डॉल्फिन मित्र भी इस अभियान में शामिल है.
वर्ल्ड बैंक और राज्य के वन विभागों की मदद से स्थानीय मछुआरों व युवकों को प्रशिक्षित कर डॉल्फिन मित्र बनाया गया है, ताकि संकट में फंसी गंगा डॉल्फिन को समय रहते मदद मिल सके और लोगों के बीच इसके संरक्षण को लेकर जागरुकता फैल सके. संकट में फंसी डॉल्फिनों की विशेष सहायता के लिए डॉल्फिन एंबुलेंस भी विकसित की जा रही है.
संतोष कहते हैं, ‘‘सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास एक हद तक कारगर रहे हैं, तभी तो इनकी संख्या लगभग स्थिर है और अवैध शिकार में भी कमी आई है. मूल बात यह कि हम गंगा डॉल्फिन या अन्य जलीय जीवों को तभी बचा सकेंगे, जब हम गंगा को बचाएंगे. इसके साथ ही गंगा नदी डॉल्फिन प्लेटफॉर्म के सभी हितधारकों को पूरे समन्वय के साथ मिलकर काम करना होगा.''











QuickLY