पीएम मोदी का बड़ा बयान, कहा- दलितों, वंचितों और आदिवासियों का कल्याण भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता

प्रधानमंत्री ने कहा, "संत तुकाराम जी की दया, करुणा और सेवा का वो बोध उनके 'अभंगों' के रूप आज भी हमारे पास है. इन अभंगों ने हमारी पीढ़ियों को प्रेरणा दी है. जो भंग नहीं होता, जो समय के साथ शाश्वत और प्रासंगिक रहता है, वही तो अभंग होता है. आज भी देश जब अपने सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ रहा है, तो संत तुकाराम जी के अभंग हमें ऊर्जा दे रहे हैं, मार्ग दिखा रहे हैं."

पीएम मोदी (Photo Credits PIB)

पुणे: भारत (India) के महान संतों को श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने मंगलवार को कहा कि दलितों, वंचितों, पिछड़ों, आदिवासियों, श्रमिकों का कल्याण देश की पहली प्राथमिकता है. मोदी ने कहा, "आज देश सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के मंत्र पर चल रहा है. सरकार की हर योजना का लाभ हर किसी को बिना भेदभाव मिल रहा है. वारकरी आंदोलन की भावनाओं को सशक्त करते हुए देश महिला सशक्तिकरण के लिए भी निरंतर प्रयास कर रहा है. 18 महीने में 10 लाख नौकरी- अमित शाह सहित केंद्रीय मंत्रियों ने प्रधानमंत्री के निर्देश का किया स्वागत

उन्होंने मंगलवार की दोपहर पुणे के देहू में जगद्गुरु श्रीसंत तुकाराम महाराज मंदिर का उद्घाटन करने के बाद बात कही.

उन्होंने कहा कि भारत की आजादी के 75वें वर्ष में कल्याणकारी योजनाओं की संतृप्ति के माध्यम से देश 100 प्रतिशत सशक्तिकरण की ओर बढ़ रहा है और इन पहलों के माध्यम से गरीबों को बुनियादी जरूरतों से जोड़ा जा रहा है. मंदिर का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि देहू का शिला मंदिर न केवल भक्ति की शक्ति का केंद्र है बल्कि भारत के सांस्कृतिक भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है.

इस अवसर पर, उन्होंने पालखी मार्ग में दो राष्ट्रीय राजमार्गों - श्री संत दिनाजेश्वर महाराज पालकी मार्ग और संत तुकाराम महाराज पालकी मार्ग के 4-लेन की आधारशिला रखने का स्मरण किया. पहला मार्ग पांच चरणों में पूरा होगा, दूसरा तीन चरणों में तैयार होगा, जिससे कुल 350 किलोमीटर लंबे राजमार्ग 11,000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से तैयार होंगे.

भारत को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित सभ्यताओं में से एक बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका श्रेय संतों और संतों की परंपराओं को जाता है, और देश शाश्वत है क्योंकि भारत संतों की भूमि है जिसमें कोई न कोई महान आत्मा देश और समाज को हर युग में दिशा देने के लिए अवतरित होती है.

वर्तमान में देश श्री संत ज्ञानेश्वर महाराज, संत निवृत्तिनाथ, संत सोपानदेव और आदि-शक्ति मुक्ता बाई-जी जैसे अन्य महान आत्माओं के अलावा संत कबीरदास की जयंती मना रहा है.

प्रधानमंत्री ने कहा, "संत तुकाराम जी की दया, करुणा और सेवा का वो बोध उनके 'अभंगों' के रूप आज भी हमारे पास है. इन अभंगों ने हमारी पीढ़ियों को प्रेरणा दी है. जो भंग नहीं होता, जो समय के साथ शाश्वत और प्रासंगिक रहता है, वही तो अभंग होता है. आज भी देश जब अपने सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ रहा है, तो संत तुकाराम जी के अभंग हमें ऊर्जा दे रहे हैं, मार्ग दिखा रहे हैं."

उन्होंने कहा, "संत नामदेव, संत एकनाथ, संत सावता महाराज, संत नरहरी महाराज, संत सेना महाराज, संत गोरोबा-काका, संत चोखामेला, इनके प्राचीन अभंगों से हमें नित नई प्रेरणा मिलती है. आज यहां संत चोखामेला और उनके परिवार द्वारा रचित सार्थ अभंगगाथा के विमोचन का भी मुझे सौभाग्य मिला है. इस सार्थ अभंगगाथा में इस संत परिवार की 500 से ज्यादा अभंग रचनाओं को आसान भाषा में अर्थ सहित बताया गया है."

पीएम मोदी ने कहा कि महान संतों ने छत्रपति शिवाजी महाराज और वीर सावरकर जैसे राष्ट्रीय नायकों को भी प्रेरित किया.

उन्होंने आगे कहा, "संत अपने आपमें एक ऐसी ऊर्जा की तरह होते हैं, जो भिन्न-भिन्न स्थितियों-परिस्थितियों में समाज को गति देने के लिए सामने आते हैं. आप देखिए, छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे राष्ट्रनायक के जीवन में भी तुकाराम जी जैसे संतों ने बड़ी अहम भूमिका निभाई है. आजादी की लड़ाई में वीर सावरकर जी को जब सजा हुई, तब जेल में वो हथकड़ियों को चिपली जैसा बजाते हुए तुकाराम जी के अभंग गाया करते थे. अलग-अलग कालखंड, अलग-अलग विभूतियाँ, लेकिन सबके लिए संत तुकाराम जी की वाणी और ऊर्जा उतनी ही प्रेरणादायक रही है!"

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए अपनी प्राचीन पहचान और परंपराओं को जीवित रखना हमारी जिम्मेदारी है, जब आधुनिक तकनीक और बुनियादी ढांचा भारत के विकास का पर्याय बन रहा है, विकास और विरासत दोनों को एक साथ आगे बढ़ना चाहिए.

संत तुकाराम एक वारकरी संत और कवि थे, जो देहू में रहते थे, जो 'अभंग' - भक्ति कविता - और 'कीर्तन' के नाम से जाने जाने वाले आध्यात्मिक गीतों के माध्यम से समुदाय-उन्मुख पूजा के लिए प्रसिद्ध थे.

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