Allahabad High Court: 6 साल की बेटी से दुष्कर्म के झूठे आरोप में उम्रकैद काट रहे डॉक्टर को हाईकोर्ट ने किया बरी; कोर्ट बोला- 'वैवाहिक विवादों में POCSO का हथियार की तरह इस्तेमाल खतरनाक'

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 6 वर्षीय बेटी से कथित दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा पाए एक डॉक्टर और उनके भाई को ससम्मान बरी कर दिया है. न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने पाया कि अलग रह रही पत्नी ने वैवाहिक विवाद के चलते बच्ची को सिखा-पढ़ाकर झूठे आरोप लगवाए थे. अदालत ने टिप्पणी की कि जब वैवाहिक झगड़ों में पॉक्सो कानून को हथियार बनाया जाए, तो बाल गवाह के बयानों की अत्यंत सावधानी से जांच की जानी चाहिए.

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में छह वर्षीय नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के गंभीर आरोप में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे एक डॉक्टर और उनके भाई को सभी आरोपों से ससम्मान बरी कर दिया है. न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा (Siddhartha Varma) और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय (Jai Krishan Upadhyay) की खंडपीठ ने वाराणसी की विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा पिछले वर्ष सुनाए गए उम्रकैद के फैसले को रद्द करते हुए जेल में बंद डॉक्टर को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है.

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए निष्कर्ष निकाला कि बच्ची को उसकी मां (जो स्वयं एक डॉक्टर हैं) द्वारा सिखाया-पढ़ाया (Tutored) गया था. अदालत ने कहा कि अलग रह रही पत्नी ने पति को आजीवन कारावास जैसी गंभीर सजा दिलाने के दुर्भावनापूर्ण इरादे से समय के साथ इन झूठे आरोपों का ताना-बाना बुना था.

मार्च 2018 का मामला और वैवाहिक विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला मार्च 2018 का है, जब पति-पत्नी के बीच संबंध तनावपूर्ण हो चुके थे. हल्द्वानी में अस्पताल संचालित करने वाले डॉक्टर पिता अपनी छह साल की बेटी को कुछ दिनों के लिए अपने साथ हल्द्वानी ले गए थे. बच्ची के वापस लौटने के बाद मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि हल्द्वानी प्रवास के दौरान पिता और चाचा ने बच्ची के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया.

अदालत में पेश बचाव पक्ष के साक्ष्यों, फोन कॉल रिकॉर्ड और तस्वीरों की समीक्षा के दौरान यह सामने आया कि हल्द्वानी में रहने के दौरान पिता और बच्ची के बीच बेहद सौहार्दपूर्ण और आत्मीय संबंध थे।बच्ची अपने पिता द्वारा दिए गए अलग मोबाइल फोन से अपनी मां से रोजाना प्रसन्नतापूर्वक बातचीत करती थी और उस दौरान उसने किसी प्रकार के दुर्व्यवहार का कोई जिक्र नहीं किया था।

अदालत ने माना: 'सिखाई गई थीं बातें, मेडिकल साक्ष्य भी मेल नहीं खाते'

खंडपीठ ने रेखांकित किया कि जब पिता ने तलाक की अर्जी दाखिल की और संपत्ति व अस्पताल निर्माण को लेकर विवाद बढ़ा, उसके बाद ही गंभीर यौन उत्पीड़न के आरोप गढ़े गए.

अदालत ने अपने फैसले में मुख्य बिंदुओं को रेखांकित किया:

वैवाहिक विवादों में पॉक्सो के इस्तेमाल पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बाल गवाहों के बयानों और वैवाहिक झगड़ों में पॉक्सो कानून (POCSO Act) के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की.

खंडपीठ ने कहा:

"जब माता या पिता में से कोई एक दूसरे के खिलाफ अन्याय की झूठी तस्वीर पेश करता है और बच्चा उस पर विश्वास करने लगता है, तो वह दूसरे अभिभावक के खिलाफ गवाही देने लगता है. ऐसे मामलों में जहां पॉक्सो अधिनियम का उपयोग पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे को फंसाने के लिए एक हथियार के रूप में किया जा रहा हो, वहां किसी भी बाल गवाह के बयानों और साक्ष्यों का परीक्षण अत्यंत सावधानी, विवेक और सूक्ष्मता के साथ किया जाना चाहिए। केवल बयानों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य उसकी पुष्टि न करते हों. इसी आधार पर दोनों अभियुक्तों को सभी आरोपों से दोषमुक्त किया जाता है."

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