H-1B Visa Fee Hike: अमेरिका में H-1B वीजा रिन्यूअल पर शुल्क बढ़ाने का प्रस्ताव; भारतीय टेक पेशेवरों पर बढ़ेगा वित्तीय दबाव
अमेरिकी प्रशासन एक नए नियामक नियम पर काम कर रहा है, जिसके तहत H-1B और L-1 वीजा के एक्सटेंशन (रिन्यूअल) के आवेदन पर कंपनियों से हजारों डॉलर का अतिरिक्त शुल्क वसूला जाएगा. अमेरिका में कुल वीजा रिन्यूअल आवेदनों का लगभग 78% हिस्सा भारतीयों का है, जिससे इस कदम का सबसे ज्यादा असर भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ेगा.
वाशिंगटन / नई दिल्ली: अमेरिका में H-1B और L-1 वीजा पर काम कर रहे हजारों भारतीय पेशेवरों के सामने नौकरी की अनिश्चितता का नया संकट खड़ा हो गया है. अमेरिकी प्रशासन एक ऐसे नए नियम को अंतिम रूप देने की तैयारी कर रहा है, जिसके तहत बड़ी टेक कंपनियों को वीजा नवीनीकरण (Extension/Renewal) के दौरान भी हजारों डॉलर का अतिरिक्त सरकारी शुल्क देना होगा.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इस नए नियम का उद्देश्य बायोमेट्रिक और रिस्पॉन्स फीस के दायरे को बढ़ाकर H-1B और L-1 वीजा धारकों के सभी एक्सटेंशन आवेदनों पर लागू करना है. चूंकि अमेरिका में वीजा एक्सटेंशन कराने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय नागरिकों का है, इसलिए इस वित्तीय बोझ का सीधा असर भारतीय टेक कर्मचारियों पर पड़ने की आशंका है. यह भी पढ़ें: US-Iran Tensions: तेहरान के रेवोल्यूशन स्क्वायर पर लगा डोनाल्ड ट्रंप के ताबूत वाला विशाल होर्डर, लिखा- 'हम ट्रंप को मार डालेंगे' (Watch Video)
बड़ी टेक कंपनियों पर कितना बढ़ेगा वित्तीय बोझ?
यह प्रस्तावित नियम उन बड़ी कंपनियों को लक्षित करता है, जिनमें 50 से अधिक कर्मचारी हैं और जिनका 50 प्रतिशत से अधिक कार्यबल H-1B या L-1 वीजा पर निर्भर है.
मौजूदा नियमों के तहत, ऐसी कंपनियों को नए वीजा आवेदन या नौकरी बदलने (Job Changes) पर H-1B के लिए $4,000 और L-1 याचिका के लिए $4,500 का अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है. नए ढांचे के तहत, कंपनियों को हर बार वीजा एक्सटेंशन आवेदन जमा करते समय भी यही भारी भरकम शुल्क चुकाना होगा.
अमेरिकी नागरिकता एवं अप्रवासन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार:
- H-1B वीजा मंजूरियों में से लगभग तीन-चौथाई मामले 'निरंतर रोजगार' (Renewal) से जुड़े होते हैं.
- भारतीय पेशेवरों को 2,26,000 से अधिक एक्सटेंशन स्वीकृतियां मिलीं, जो कुल रिन्यूअल आवेदनों का लगभग 78% है.
- अमेजन, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी प्रमुख टेक कंपनियां इन याचिकाओं की सबसे बड़ी लाभार्थी हैं, जिनके लिए अब वीजा अनुपालन (Compliance) लागत काफी बढ़ जाएगी.
छंटनी के दौर में भारतीय आईटी पेशेवरों के सामने दोहरी चुनौती
अतिरिक्त वीजा शुल्क का यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब वैश्विक टेक उद्योग पहले से ही बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी से गुजर रहा है.
नौकरी गंवाने वाले H-1B धारकों को अमेरिका में रहने के लिए 60 दिनों के भीतर नया प्रायोजक (Sponsor) खोजना होता है या देश छोड़ना पड़ता है. आव्रजन (Immigration) विशेषज्ञों का कहना है कि नए शुल्क के कारण कई कंपनियां नए कर्मचारियों को प्रायोजित करने या उनके वीजा रिन्यूअल का खर्च उठाने से कतरा सकती हैं.
यद्यपि यह नियम वीजा की मूल पात्रता शर्तों में बदलाव नहीं करता, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अतिरिक्त वित्तीय बोझ से कंपनियां विदेशी प्रतिभाओं की रिटेंशन और नई भर्तियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो सकती हैं.