वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे: चुनौतियों के बीच जीवन की रोशनी

सऊदी में कारोबार छोड़कर भारत लौटे अशरफ अब सोशल मीडिया पर अपने बेटे की प्रगति दुनिया तक पहुंचा रहे हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सऊदी में कारोबार छोड़कर भारत लौटे अशरफ अब सोशल मीडिया पर अपने बेटे की प्रगति दुनिया तक पहुंचा रहे हैं. केरल के शाबिन के ऑटिज्म की यात्रा को हर कोने से मिल रहा है प्यार.केरल के पलक्कड में रहने वाले अशरफ और रसीना को अपने बेटे शाबिन के बारे में तब चिंता होने लगी, जब दो-ढाई साल की उम्र में भी वह कुछ नहीं बोल पा रहा था. लोग अलग-अलग राय देते थे. लेकिन माता-पिता का दिल जो ठहरा, रसीना और अशरफ को महसूस हुआ कि बात कुछ और है.

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शाबिन साढ़े चार साल का था, जब डॉक्टर ने बताया कि उसे स्पीच थेरपी की जरूरत है. उस समय रसीना गर्भवती थीं और अस्पताल आना-जाना मुश्किल था. अशरफ भी तब सऊदी अरब में थे, तो एक दिन रसीना ने रोते हुए उन्हें फोन किया और भारत लौटने को कहा.

अशरफ सऊदी अरब में फोटोग्राफी का काम कर रहे थे, लेकिन परिवार के लिए सबकुछ छोड़कर वापस चले आए. भारत में एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक ने बताया कि शाबिन को ऑटिज्म है. यह पहली बार था, जब अशरफ ने यह शब्द सुना. बेंगलुरू के एक बड़े अस्पताल में ऑटिज्म से प्रभावित दूसरे बच्चों और उनके माता-पिता को देखकर अशरफ को पहली बार स्थिति की गंभीरता समझ आई.

थेरपी की सीमाएं और संघर्ष की शुरुआत

भारत लौटने के बाद स्पीच थेरपी, ऑक्यूपेशनल थेरपी और कई तरह के मूल्यांकन शुरू हुए. खर्च बढ़ता गया पर सुधार धीमा था. डेढ़ साल तक लगातार कोशिश करने के बावजूद शाबिन के बोलने में खास प्रगति नहीं हुई.

आर्थिक मोर्चे पर भी चुनौती खड़ी हो चुकी थी. अशरफ के मुताबिक, वह सऊदी में जिन्हें अपना कारोबार सौंपकर आए थे उन्होंने धोखे से वह भी खत्म कर दिया था. फिर भी अशरफ ने हिम्मत नहीं हारी और छोटे पैमाने पर रबर की खेती कर परिवार का गुजारा शुरू किया.

ढोल बजाना सीख कर ऑटिज्म से लड़ सकते हैं बच्चे

स्पेशल स्कूल भेजने पर भी उन्हें संतोष नहीं मिला. स्कूल में थेरपी तो थी, लेकिन ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी थी. न बोलने में प्रगति हुई, न बिना शब्दों के होने वाली अभिव्यक्ति में. अशरफ मानते हैं कि स्पेशल स्कूल, डाउन सिंड्रोम या अन्य स्थितियों वाले बच्चों के लिए ठीक हो सकता है, पर ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए नहीं.

फिर मां ने थामी पढ़ाई की कमान

रसीना ने अपने इलाके के एक वरिष्ठ डॉक्टर से कुछ दिन की ट्रेनिंग ली. वहां उन्हें सिखाया गया कि ऑटिज्म वाले बच्चों को जबरदस्ती नहीं, बल्कि धैर्य और दोहराव से सिखाया जाता है. फिर तो रसीना ने घर को ही स्कूल बना दिया.

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वह शाबिन को रोजमर्रा के हर काम में अपने साथ रखती थीं. खाना बनाना, सफाई, कपड़े तह करना, पानी भरना हर काम में शाबिन उनके साथ होता. धीरे-धीरे शाबिन ने भी कई काम सीख लिए. परिवार बताता है कि वह खूब ऐक्टिव हैं और अचानक सड़क की ओर भी चल देता थे. तब शाबिन के चाचा ने घर के बाहर लकड़ी का एक बैरियर लगाया. कुछ ही दिनों में शाबिन समझ गए कि बैरियर के पार नहीं जाना है.

सोशल मीडिया की ताकत और जागरूकता का नया रास्ता

एक दिन अखबार पढ़ते समय अशरफ ने नोटिस किया कि शाबिन एक घंटे तक शांत बैठा रहा. यह उनके लिए हैरान करने वाली बात थी. उन्होंने तस्वीर खींची और फेसबुक पर डाल दी. लोगों की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित थी. सवाल आने लगे कि यह बच्चा कौन है.

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यहीं से रोजमर्रा के वीडियो पोस्ट करने की शुरुआत हुई- कपड़े तह करना, खाना, संगीत सुनना, साफ-सफाई में मदद करना. कुछ ही महीनों में दुनियाभर से कई लोग उनके साथ जुड़ गए. अशरफ बताते हैं कि उनकी ऑडियंस में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनकी उम्र 30 से 60 साल के बीच है. खासकर वे महिलाएं, जो स्पेशल बच्चों की परवरिश कर रही हैं.

आज फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लोग न सिर्फ शाबिन को देखते हैं बल्कि कमेंट और फोन के जरिये प्यार और हौसला भी देते हैं. सोशल मीडिया ने इस परिवार को आवाज दी है. साथ ही, शाबिन की यात्रा ने हजारों परिवारों के बीच नई जागरूकता भी जगाई है.

भारत में ऑटिज्म की चुनौतियां और विशेषज्ञों की चिंता

दिल्ली में काम कर रहीं थेरपिस्ट रश्मि दत्ता बताती हैं कि भारत में ऑटिज्म को लेकर जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन अभी भी यह बहुत सतही है. जितने उपाय मौजूद हैं, सब निजी क्षेत्र में हैं. सरकारी क्षेत्र में तो सिर्फ विकलांगता का कार्ड ही मिलता है.

लोग ऑटिज्म शब्द पहचानते तो हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि ऐसी स्थिति में बच्चे को भावनात्मक और सामाजिक रूप से कैसे समझना चाहिए. रश्मि बताती हैं कि बड़े शहरों में कुछ सुविधाएं मिल जाती हैं, लेकिन छोटे शहरों में प्रशिक्षित थेरपिस्ट मिलना मुश्किल है. इसके अलावा थेरपी महंगी भी है, तो कई परिवार लंबे समय तक इसका खर्च नहीं उठा पाते हैं.

थेरपी की सीमाओं को रेखांकित करते हुए रश्मि बताती हैं कि ज्यादातर में केवल बोलना, बैठना, सीखना जैसे कौशल पर ध्यान दिया जाता है, भावनात्मक विकास पर नहीं. जबकि, दीर्घकालिक सुधार के लिए भावनात्मक विकास सबसे महत्वपूर्ण है. कमियों के बावजूद रश्मि को उम्मीद भी नजर आती है.

वह सलाह देती हैं कि अगर परिवार जल्दी हस्तक्षेप करे, बच्चे के साथ समय बिताए और सही थेरपी चुने, तो बच्चे में बड़ा सुधार मुमकिन है. वह बताती हैं कि कई बच्चे आज कॉलेज में हैं, या बोर्ड परीक्षाएं दे रहे हैं क्योंकि उनके परिवार ने सही समय पर सही कदम उठाए.

बड़ी चिंता भविष्य की, लेकिन उम्मीद भी उतनी ही मजबूत

हर माता-पिता की तरह अशरफ और रसीना की सबसे बड़ी चिंता यही है कि उनके बाद शाबिन का क्या होगा. वह बोल नहीं सकते और अपनी जरूरतें खुद नहीं बता पाते. अशरफ चाहते हैं कि सरकार की ओर से ऐसे केयर होम और सुरक्षित संस्थान बनाए जाएं, जहां ऑटिज्म से प्रभावित वयस्क ताउम्र सम्मान के साथ रह सकें.

अशरफ कहते हैं कि सऊदी में लाखों का कारोबार भले खत्म हो गया हो, लेकिन पत्नी और तीन बच्चों का साथ होना ही उनकी असली संपत्ति है. शाबिन की छोटी-छोटी प्रगति उन्हें बड़ी उम्मीद देती है. यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की साझा आवाज है जो ऑटिज्म के साथ जीवन को समझने और संवारने के लिए हर दिन नया साहस जुटाते हैं.

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