जरुरी जानकारी | मत्स्य पालन सब्सिडी पर डब्ल्यूटीओ समझौता का अनुमोदन नहीं करने का आग्रह
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. व्यापार विशेषज्ञों और नागरिक समाज के कुछ सदस्यों ने भारत से आग्रह किया है कि वह पिछले साल जिनेवा में विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों द्वारा सहमत मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते का अनुमोदन न करे और इसके बजाय एक व्यापक समझौते के लिए बातचीत शुरू करे। 17 जून, 2022 को जिनेवा स्थित विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्यों ने एक 'जिनेवा पैकेज' हासिल किया, जिसमें मछली पकड़ने पर दी जाने वाली नुकसानदेह सब्सिडी पर अंकुश लगाने और कोविड-19 टीकों के उत्पादन के लिए अस्थायी पेटेंट छूट पर समझौते शामिल थे।
नयी दिल्ली, 24 जुलाई व्यापार विशेषज्ञों और नागरिक समाज के कुछ सदस्यों ने भारत से आग्रह किया है कि वह पिछले साल जिनेवा में विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों द्वारा सहमत मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते का अनुमोदन न करे और इसके बजाय एक व्यापक समझौते के लिए बातचीत शुरू करे। 17 जून, 2022 को जिनेवा स्थित विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्यों ने एक 'जिनेवा पैकेज' हासिल किया, जिसमें मछली पकड़ने पर दी जाने वाली नुकसानदेह सब्सिडी पर अंकुश लगाने और कोविड-19 टीकों के उत्पादन के लिए अस्थायी पेटेंट छूट पर समझौते शामिल थे।
अंतिम रूप दिया गया मत्स्य पालन समझौता विकसित देशों को, जो सुदूर जल में मछली पकड़ने में लगे हुए हैं, अवैध, असूचित और अनियमित मछली पकड़ने की गतिविधियों के लिए सब्सिडी प्रदान नहीं करने से रोक देगा। हालांकि, देशों को समझौते के अन्य मुद्दों पर बातचीत करनी होगी जिसमें अत्यधिक मछली पकड़ना और अत्यधिक क्षमता से मछली पकड़ना शामिल है।
नागरिक समाज, ट्रेड यूनियनों और गैर-सरकारी संगठनों के कुछ सदस्यों द्वारा वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को भेजे गए एक पत्र के अनुसार, ‘‘हम सरकार से इस गैर-बराबरी वाले समझौते की पुष्टि नहीं करने का आग्रह करते हैं। इसके बजाय, सरकार को व्यापक समझौते पर बातचीत शुरू करनी चाहिए, जो पहले से ही अनुच्छेद-5 के तहत औद्योगिक मछली पकड़ने वाले देशों के लिए अत्यधिक क्षमता और अत्यधिक मछली पकड़ने से संबंधित विषयों के बारे में अनिवार्य है।’’
समझौते को प्रभावी बनाने के लिए डब्ल्यूटीओ के दो-तिहाई सदस्यों की स्वीकृति आवश्यक है। अबतक 10 से अधिक देशों ने इसका अनुमोदन कर दिया है। भारत ने अभी तक इस समझौते का अनुमोदन नहीं किया है। कुल मिलाकर इसमें 164 सदस्य हैं।
पत्र में कहा गया है, ‘‘हम इस बात पर जोर देते हैं कि भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए अब भी एकजुट होने का समय है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि समझौता लागू न हो।'' पत्र में आरोप लगाया गया है कि विकसित देशों के पास बड़े औद्योगिक मछली पकड़ने के बेड़े हैं और उन्होंने विकासशील देशों में बाजार पहुंच बढ़ाने के लिए लगातार अपने एजेंडा को आगे बढ़ाया है।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘देशभर में अरबों डॉलर की मत्स्य पालन सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा औद्योगिक मछली पकड़ने के लिए प्रदान किया जाता है और केवल छोटे पैमाने पर मछली पकड़ने के लिए काफी कम मात्रा में सब्सिडी प्रदान की जाती है। ऐतिहासिक रूप से, अत्यधिक मछली पकड़ने से घटते संसाधन जैसे मौजूदा संकट के लिए विशेष रूप से यूरोप और उत्तरी अमेरिका में औद्योगिक स्तर पर मछली पकड़ना ही जिम्मेदार है।’’
पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में नेशनल फिशवर्कर्स फोरम, नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर स्मॉल स्केल फिश वर्कर्स, ऑल इंडिया फिशर्स एंड फिशरीज वर्कर्स फेडरेशन, ऑल इंडिया यूनियन ऑफ फॉरेस्ट वर्किंग पीपल, दिल्ली के काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के प्रतिष्ठित प्रोफेसर, बिस्वजीत धर, माछीमार अधिकार संघर्ष समिति (एमएएसएस) गुजरात के महासचिव, भरत पटेल और दिल्ली साइंस फोरम से कमला मेनन शामिल हैं।
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