देश की खबरें | केंद्र की सलाह के 10 साल बाद भी मध्य प्रदेश में विशेष बाघ संरक्षण बल नहीं है

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. मध्य प्रदेश में विशेष बाघ संरक्षण बल (एसटीपीएफ) का गठन केंद्र की सलाह के 10 साल बाद भी नहीं हुआ है। वर्ष 2012 से देश में सबसे ज्यादा बाघों की मौत मध्य प्रदेश में ही हुई है।

नयी दिल्ली, 28 जुलाई मध्य प्रदेश में विशेष बाघ संरक्षण बल (एसटीपीएफ) का गठन केंद्र की सलाह के 10 साल बाद भी नहीं हुआ है। वर्ष 2012 से देश में सबसे ज्यादा बाघों की मौत मध्य प्रदेश में ही हुई है।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के मुताबिक, भारत में 2012 से अब तक 1,059 बाघों की मौत हो चुकी है। मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 270 बाघों की मौत हुई है। इस राज्य को 'बाघ राज्य' के रूप में जाना जाता है।

वर्ष 2018 की बाघ गणना के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 526 बाघों के साथ भारत के 'बाघ राज्य' के रूप में उभरा था। इसके बाद कर्नाटक में 524 बाघों की जान गई है।

मध्य प्रदेश में इस साल अब तक 27 बाघों की मौत हो चुकी है, जबकि पिछले साल 41 बाघों की जान गई थी। प्रदेश में छह बाघ अभयारण्य हैं।

एनटीसीए ने 2009-2010 में उन राज्यों को सलाह दी थी जहां बाघों की संख्या अधिक है कि वे विशेष पुलिसकर्मियों को भर्ती कर उन्हें प्रशिक्षित करें ताकि वे बाघों की सुरक्षा के लिए वनों में गश्त कर सकें।

इसके बाद एसटीपीएफ कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, ओडिशा और असम में गठित कर दी गई। इसमें बाघ परियोजना योजना के तहत केंद्र सरकार से 60 फीसदी सहायता मिलती है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, एनटीसीए और मध्य प्रदेश के बीच 2012 में हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत राज्यों को समझौते पर हस्ताक्षर होने के दो साल के भीतर बल को गठित करना, हथियार देना और अपने बाघ अभयारण्यों में तैनात करना था।

मध्य प्रदेश ने इसके बाद राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों की सुरक्षा के लिए ‘स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स’, स्मार्ट गश्ती और श्वान दस्तों को गठित किया है लेकिन एसटीपीएफ गठित नहीं किया गया है।

मध्य प्रदेश के मुख्य वन्यजीव वार्डन जे. एस. चौहान ने कहा कि प्रदेश के पास बाघों की सुरक्षा के लिए मजबूत तंत्र है और एसटीपीएफ के न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है।

उन्होंने कहा कि एसटीपीएफ गठित करने का फैसला राज्य सरकार के स्तर पर किया जाएगा। उन्होंने कहा, “ अधिकतर बाघों की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई हैं जिनमें आपसी लड़ाई, बीमारी और उम्र शामिल है। अप्राकृतिक कारणों से बाघों की मौत की संख्या में अहम वृद्धि नहीं हुई है। हम कुछ नहीं छुपा रहे है।”

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