देश की खबरें | संविधान की प्रस्तावना में शामिल ‘समाजवादी’ व ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द वैचारिक सुरंगें: ‘ऑर्गनाइजर’

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध एक साप्ताहिक पत्रिका में प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द ‘वैचारिक बारूदी सुरंगें’ हैं, जिन्हें ‘धार्मिक मूल्यों’ को नष्ट करने और ‘राजनीतिक तुष्टीकरण’ के लिए शामिल किया गया था।

नयी दिल्ली, 14 जुलाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध एक साप्ताहिक पत्रिका में प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द ‘वैचारिक बारूदी सुरंगें’ हैं, जिन्हें ‘धार्मिक मूल्यों’ को नष्ट करने और ‘राजनीतिक तुष्टीकरण’ के लिए शामिल किया गया था।

आलेख के अनुसार अब समय आ गया है कि उस गलती को सुधारा जाए और संविधान को मूल स्वरूप में वापस लाया जाए।

कुछ दिन पहले आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इस बात पर राष्ट्रीय बहस का आह्वान किया कि क्या प्रस्तावना में ये दो शब्द वहीं बने रहने चाहिए, क्योंकि वे कभी भी मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे।

साप्ताहिक पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ की वेबसाइट पर शनिवार को प्रकाशित आलेख में संविधान की प्रस्तावना में इन दो शब्दों को शामिल किए जाने को ‘संवैधानिक धोखाधड़ी’ करार दिया गया। इसमें कहा गया कि ये शब्द महज ‘सौंदर्यवर्धक जोड़’ नहीं हैं, बल्कि ‘वैचारिक रूप से चीजें थोपने के समान’ भी हैं जो भारत की सभ्यतागत पहचान और संवैधानिक लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत हैं।

लेख में कहा गया है, ‘‘...किसी भी संविधान सभा ने इन शब्दों को कभी मंजूरी नहीं दी। 42वां संशोधन आपातकाल के दौरान पारित किया गया था, जब संसद दबाव में काम कर रही थी, विपक्षी नेता जेल में थे और मीडिया पर प्रतिबंध लगा हुआ था।’’

उसमें आगे कहा गया है कि यह ‘‘संवैधानिक धोखाधड़ी’’ का कृत्य था।

डॉ. निरंजन बी. पूजार ने ‘प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्षता का पुनरावलोकन’ शीर्षक से लिखे गए अपने लेख में कहा, ‘‘भारत को मूल प्रस्तावना पर वापस लौटना चाहिए जैसा कि संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी...। आइए हम आपातकाल के संवैधानिक पाप को समाप्त करें और भारत के लोगों के लिए प्रस्तावना को पुनः प्राप्त करें।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द भावना से भारतीय नहीं हैं, कार्यप्रणाली से संवैधानिक नहीं हैं और अपनी मंशा से लोकतांत्रिक नहीं हैं। ये वैचारिक बारूदी सुरंगें हैं, जिन्हें धार्मिक मूल्यों को नष्ट करने, राज्य की पहुंच को उचित ठहराने और राजनीतिक तुष्टीकरण के लिए तैयार किया गया।’’

लेख में कहा गया है कि ‘संवैधानिक सफाई’ आवश्यक है, इसलिए 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को हटाना विचारधारा के बारे में नहीं है, बल्कि ‘संवैधानिक ईमानदारी को बहाल करना, राष्ट्रीय गरिमा को पुनः प्राप्त करना और राजनीतिक पाखंड को समाप्त करना’ है।

राजकुमार अविनाश

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