देश की खबरें | देवीधुरा बग्वाल में आजादी के अमृत महोत्सव का जोश, तिरंगे के साथ पहुंचे लोग

चंपावत, 12 अगस्त आजादी के अमृत महोत्सव का जोश शुक्रवार को उत्तराखंड के चंपावत जिले के मां बाराही धाम देवीधुरा में खेले गए अनूठे और रोमांच से भरपूर प्रसिद्ध पाषाणयुद्ध ‘बग्वाल’ में भी देखने को मिला जहां बग्वाली वीर फर्रों और लठ्ठों के साथ तिरंगा हाथ में लेकर मैदान में पहुंचे।

कोरोना संबंधी प्रतिबंधों के चलते दो साल के अंतराल के बाद हुए बग्वाल के साक्षी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बने। इस दौरान, उन्होंने मां बाराही मंदिर में विधि विधान से पूजा की।

इस मौके पर धामी ने कहा कि रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर देवीधुरा में होने वाले बग्वाल की ख्याति पूरे देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है।

देवीधुरा में उमड़े जनसैलाब के बीच 11 मिनट तक बग्वाल चला। हालांकि जिला प्रशासन के निर्देशों के बावजूद कुछ लोगों ने फल और फूलों की जगह एक दूसरे पर पत्थर फेकें जिसमें दर्शकों सहित 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए जिन्हें बाद में उपचार दिया गया। यह जानकारी एक अधिकारी ने दी।

उन्होंने बताया कि घायलों में से तीन को इलाज के लिए उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया गया।

बग्वाल में पत्थर फेंकने पर प्रतिबंध है और इसकी जगह फूल और फलों से युद्ध किया जाता है। हालांकि, इसमें हिस्सा लेने वाले कुछ लोग छिपाकर अब भी पत्थर फेंक देते हैं जिससे लोग घायल हो जाते हैं।

मान्यता है कि अनादिकाल में देवीधुरा के बाराही धाम में नरबलि देने की परंपरा थी जहां गहड़वाल, चमियाल, वालिक और लमगडिया खाम (गुट) से जुड़े लोग बारी-बारी से इस परंपरा को निभाते थे। एक बार जब चमियाल खाम की बारी आई तो उनके यहां बुढिया दादी व एक पोता ही बचे रह गए। तब बुढ़िया की प्रार्थना पर नरबलि की जगह आपस में खामों द्वारा एक दूसरे के ऊपर पत्थरों से युद्ध करने का निर्णय हुआ और तय किया गया कि युद्ध तब तक चलेगा जब तक कि एक व्यक्ति के बराबर रक्त न बह जाए। तब से ही इस परंपरा को बग्वाल कहा जाने लगा।

इस परंपरा में गहड़वाल और चमियाल खाम बाजार क्षेत्र और लमगडिया और वालिक खाम मंदिर क्षेत्र की ओर से बाराही मंदिर के खोलीखांड दुर्बाचौड़ मैदान में बग्वाल करते आए है।

इस बार आजादी के अमृत महोत्सव काल में खेले गए बग्वाल में वीर फर्रों और लठ्ठों के साथ ही तिरंगा लेकर मैदान में पहुंचे।

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