पत्रकारिता की आजादी बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का मूल आधार है: न्यायालय

न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की दो याचिकाओं पर सुनाये गये फैसले में मीडिया की आजादी के बारे में यह सख्त टिप्पणियां कीं।

जमात

नयी दिल्ली, 19 मई उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि पत्रकारिता की आजादी संविधान में प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का मूल आधार है और भारत की स्वतंत्रता उस समय तक सुरक्षित है जब तक पत्रकार किसी तरह के दमन की धमकी के बगैर सत्तासीन के सामने अपनी बात रख सकते हैं।

न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की दो याचिकाओं पर सुनाये गये फैसले में मीडिया की आजादी के बारे में यह सख्त टिप्पणियां कीं।

अर्नब ने पालघर में दो साधुओं सहित तीन व्यक्तियों की पीट पीट कर हत्या किये जाने की घटना के बारे में अपने कार्यक्रम को लेकर दर्ज प्राथमिकी और निजी शिकायतों में चल रही आपराधिक जांच निरस्त करने के लिये ये याचिकायें दायर की थीं।

पीठ ने अर्नब गोस्वामी को आंशिक राहत प्रदान करते हुये शुरूआती प्राथमिकी, जिसकी जांच मुंबई पुलिस कर रही है, के अलावा शेष 14 प्राथमिकी रद कर दीं। साथ ही इस मामले में उन्हें किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई से तीन सप्ताह का संरक्षण भी प्रदान कर दिया।

हालांकि, पीठ ने इन मामलों की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो को सौंपने का अर्नब गोस्वामी का अनुरोध ठुकरा दिया।

पीठ ने अपने 56 पेज के फैसले में कहा कि एक पत्रकार के खिलाफ एक ही घटना के संबंध में अनेक आपराधिक मामले दायर नहीं किये जा सकते हैं। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में प्रदत्त अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार और आपराधिक मामले की जांच के संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का भी जिक्र किया।

पीठ ने कहा, ‘‘पत्रकारिता की आजादी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में प्रदत्त संरक्षित अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का मूल आधार है। याचिकाकर्ता मीडिया से जुड़ा पत्रकार है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में प्रदत्त अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुये याचिकाकर्ता ने टेलीविजन पर प्रसारित कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त किये थे। भारत की स्वतंत्रता उस समय तक सुरक्षित है जब तक पत्रकार बगैर किसी भय के सत्ता के सामने अपनी बात रख सकते हैं।’’

हालांकि , न्यायालय ने कहा कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का मौलिक अधिकार मुकम्मल नहीं है और मीडिया की भी तर्कसंगत पाबंदी से संबंधित प्रावधानों के दायरे में जवाबदेही है। लेकिन एक ही घटना के बारे में पत्रकार को कई सारी शिकायतों का सामना करने और कई राज्यों में राहत के लिये चक्कर लगाने के लिये बाध्य करना इस आजादी का गला घोंटना है।

पीठ ने कहा कि यद्यपि एक पत्रकार की बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी ऊंचे पायदान पर नहीं है लेकिन बतौर समाज हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि पहले का दूसरे के बगैर अस्तित्व नहीं रह सकता। नागरिकों की स्वतंत्रता का अस्तित्व नहीं बचेगा अगर मीडिया को एक दृष्टिकोण अपनाने के लिये बाध्य किया जाये।

न्यायालय ने एक प्राथमिकी के अलावा शेष प्राथमिकी निरस्त करते हुये अपने फैसले में कहा कि जिस तरह से अर्नब के खिलाफ कई राज्यों में एक के बाद एक कई प्राथमिकी दर्ज की गयी हैं उसे देखते हुये इसमें कोई संदेह नहीं बचता कि याचिकाकर्ता के एक नागरिक के रूप में अधिकारों की रक्षा के लिये न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।

पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को राहत और प्राथमिकी निरस्त कराने के लिये संबंधित उच्च न्यायालयों के चक्कर लगाने का नतीजा कई कार्यवाही और याचिकाकर्ता, जो एक पत्रकार है, के लिये अनावश्यक परेशान करने वाला होगा।

अनूप

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