देश की खबरें | न्यायालय ने दुर्लभ बीमारी के मरीज के लिए दवा खरीदने के केंद्र को दिए आदेश पर रोक लगाई
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें केंद्र को ‘स्पाइनल मस्कुलर अट्रोफी’ (एसएमए) से पीड़ित एक मरीज को 50 लाख रुपये की सीमा से परे 18 लाख रुपये की अतिरिक्त दवाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
नयी दिल्ली, 26 फरवरी उच्चतम न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें केंद्र को ‘स्पाइनल मस्कुलर अट्रोफी’ (एसएमए) से पीड़ित एक मरीज को 50 लाख रुपये की सीमा से परे 18 लाख रुपये की अतिरिक्त दवाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
‘स्पाइनल मस्कुलर अट्रोफी’ बच्चों में पाई जाने वाली एक दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी है जो मांसपेशियों के काम करने के तरीके को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है।
प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने 24 फरवरी को केंद्र की याचिका पर प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया।
पीठ ने कहा कि 17 अप्रैल तक नोटिस का जवाब दिया जाए। उसने कहा, ‘‘जिस फैसले को चुनौती दी गई है उसके तहत दिए आदेश पर अगली सुनवाई की तारीख तक रोक रहेगी।’’
इस नीति के तहत केंद्र सरकार जरूरतमंद मरीज को इलाज के लिए 50 लाख रुपये तक दे सकती है।
उच्च न्यायालय ने छह फरवरी को निर्देश दिया था कि जब तक एसएमए की दवा की उच्च कीमत का मामला एकल न्यायाधीश की पीठ हल नहीं कर लेती, तब तक एक बार के उपाय के तौर पर 24 वर्षीय सेबा पीए को दवा ‘रिसडिप्लाम’ प्रदान की जानी चाहिए ताकि उसका निरंतर उपचार सुनिश्चित किया जा सके। एकल पीठ की फैसला करने की प्रक्रिया में कम से कम एक महीने का समय लगने की संभावना है।
उच्च न्यायालय के समक्ष दायर सेबा की याचिका में ‘रिसडिप्लाम’ की अत्यधिक लागत पर प्रकाश डाला गया है। इस दवा की कीमत 6.2 लाख रुपये प्रति बोतल है।
इस बीमारी से पीड़ित 20 किलोग्राम तक वजन वाले मरीजों को महीने में एक बोतल की जरूरत होती है, जबकि अधिक वजन वाले मरीजों को तीन बोतलों तक की जरूरत पड़ सकती है, जिससे दीर्घकालिक उपचार आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो जाता है।
केंद्र ने तर्क दिया कि हालांकि उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि उसका यह फैसला और मामलों के लिए बाध्यकारी मिसाल नहीं है, लेकिन किसी एक व्यक्ति को छूट देने से एक उदाहरण पेश होता है।
इसमें कहा गया है, ‘‘भारत में 3,000 से अधिक मरीज हैं, जिनकी परिस्थितियां अलग-अलग हैं और यदि प्रत्येक मामले पर अलग-अलग गौर किया जाए तो इससे ऐसा वित्तीय बोझ पैदा हो सकता है जिसे वहन करना संभव नहीं होगा।’’
केंद्र के वकील ने कहा कि सरकार की नीति में सभी मरीजों के लिए 50 लाख रुपये की सीमा तय की गई है, चाहे उपलब्ध संसाधन कुछ भी हों।
सेबा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने कहा कि सरकार या तो दवा निर्माता के साथ बातचीत करके या पेटेंट अधिनियम, 1970 के प्रावधानों को लागू करके एसएमए के उपचार की लागत को कम करने के लिए कदम उठा सकती थी।
ग्रोवर ने कहा कि चीन और पाकिस्तान जैसे देशों ने दवा निर्माता के साथ बातचीत कर एसएमए उपचार की कीमत कम करने में सफलता हासिल की है।
उन्होंने सवाल किया कि भारत ने इसी तरह के कदम क्यों नहीं उठाए।
पीठ ने कहा कि भारत सरकार संभवत: ‘‘अंतरराष्ट्रीय प्रभावों’’ के कारण ऐसे कदम उठाने से बच रही है।
पीठ ने कहा, ‘‘भारत सरकार इसमें दिलचस्पी क्यों नहीं लेगी? वे इसमें बहुत दिलचस्पी लेंगे। इस पर आलोचना करना आसान है। उन्होंने कीमतें कम करने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश की होगी।’’
पीठ ने केंद्र से कहा कि वह मामला-दर-मामला आधार पर 50 लाख रुपये से अधिक के व्यय को मंजूरी देने की संभावना तलाशे।
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