देश की खबरें | अदालत ने 6 पुलिसकर्मियों की हत्या के मामले में दो माओवादियों को दिए गए मृत्युदंड पर खंडित फैसला सुनाया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. झारखंड उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने 2013 में पुलिस दल पर हुए हमले के लिए दो माओवादियों को दी गई मौत की सजा के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए खंडित फैसला सुनाया।

रांची, 20 जुलाई झारखंड उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने 2013 में पुलिस दल पर हुए हमले के लिए दो माओवादियों को दी गई मौत की सजा के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए खंडित फैसला सुनाया।

इस हमले में पाकुड़ के पुलिस अधीक्षक (एसपी) अमरजीत बलिहार सहित छह पुलिसकर्मी मारे गए थे।

न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय दोषियों को बरी करने के पक्ष में थे, जबकि न्यायमूर्ति संजय प्रसाद ने मौत की सजा बरकरार रखी।

उच्च न्यायालय प्रवीर मुर्मू उर्फ 'प्रवीर दा' और संतन बास्के उर्फ 'ताला दा' द्वारा दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रहा था।

इस मामले की सुनवाई दुमका सत्र न्यायालय में हुई थी जिसने 26 सितंबर, 2018 को दोषियों को मौत की सजा सुनाई।

इसके बाद दोषियों ने उच्च न्यायालय में अपनी-अपनी अपीलें दायर कीं। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 17 जुलाई को 197 पृष्ठों का फैसला सुनाया।

एसपी बलिहार के नेतृत्व वाली पुलिस टीम पर दो जुलाई, 2013 को माओवादियों ने हमला किया था।

माओवादियों ने दो पुलिस वाहनों पर गोलीबारी की जिसमें छह पुलिसकर्मी (राजीव कुमार शर्मा, मनोज हेम्ब्रम, चंदन कुमार थापा, अशोक कुमार श्रीवास्तव, संतोष कुमार मंडल और बलिहार) मारे गए।

कांस्टेबल लेबेनियस मरांडी और धनराज मरैया, जो टीम का हिस्सा थे, इस नरसंहार में बच गए।

मरांडी और मरैया ने प्रत्यक्षदर्शी के रूप में बयान दिए और दावा किया कि उन्होंने हमलावरों को प्रवीर और ताला का नाम पुकारते हुए सुना था।

अभियोजन पक्ष ने दो प्रत्यक्षदर्शियों सहित 31 गवाहों से जिरह की।

अपना फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान विश्वसनीय नहीं थे। उन्होंने कहा कि गवाहों ने गवाही दी थी कि हमले के बाद वे बेहोश हो गए थे और इसलिए अपीलकर्ताओं के नाम नहीं सुन पाए थे।

उन्होंने कहा कि मरांडी और मरैया दोनों घटना के गवाह थे, लेकिन उन्होंने दोषियों को नहीं देखा था।

न्यायमूर्ति मुखोपाध्याय ने मामले में दोषसिद्धि और मृत्युदंड के आदेश को रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति प्रसाद ने एक अलग दृष्टिकोण अपनाया और कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों ने अदालत में प्रवीर और ताला की पहचान घटनास्थल पर मौजूद रहने वाले व्यक्ति के रूप में की थी।

उन्होंने आगे कहा कि अपने आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करते हुए भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी और उनकी टीम की नृशंस हत्या कर दी गई थी।

मृत्युदंड की सजा की पुष्टि करते हुए न्यायमूर्ति प्रसाद ने राज्य सरकार को मृतक एसपी के परिजनों को दो करोड़ रुपये का मुआवजा देने और उनके बेटे या बेटी को डीएसपी या डिप्टी कलेक्टर के पद पर नौकरी देने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति प्रसाद ने निर्देश दिया कि घटना में मारे गए पांच पुलिसकर्मियों के परिवार के सदस्यों को 50-50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। उन्होंने राज्य सरकार से कहा कि वह पुलिसकर्मियों के आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर चतुर्थ श्रेणी की नौकरी भी दें।

उम्मीद है कि आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए इस मामले को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उठाया जाएगा।

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