देश की खबरें | उच्चतम न्यायालय ने बेसहारा बच्चों की पहचान करने में एनजीओ को शामिल करने को कहा
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नयी दिल्ली, 18 अप्रैल उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) से कहा कि वह गैर सरकारी संगठनों और बाल अधिकार के लिए काम करने वाले लोगों को बेसहारा हो चुके बच्चों की पहचान करने में शामिल करे।
न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने कहा कि वह करीब डेढ़ साल से इसकी निगरानी कर रही है लेकिन प्रगति संतोषजनक नहीं है। पीठ ने कहा, ‘‘हम अभी भी पहचान के चरण में हैं, हम आगे नहीं बढ़ रहे हैं।’’
सुनवाई की शुरुआत में मामले में एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने शीर्ष अदालत से बेसहारा हो चुके बच्चों की पहचान करने में नागरिक संस्थाओं को शामिल किए जाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय कानून, 2005 के तहत गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को देखभाल की आवश्यकता वाले बच्चों से संबंधित प्रक्रिया में शामिल करने की इजाजत है।
पीठ ने कहा कि एनसीपीसीआर को बच्चों की पहचान करने में सहायता देने के इच्छुक व्यक्तियों या संगठनों की मदद लेनी चाहिए। पीठ ने कहा, ‘‘सरकार को कानून के तहत जो कुछ भी करना है, वह नहीं कर सकती है और अगर कोई इसमें मदद के लिए आगे आना चाहता है, तो आपको उन्हें शामिल करना चाहिए।’’
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘ऐसे संगठन और लोग हैं जो अपना सारा समय इस पर दे रहे हैं। आपको उनके साथ सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए।’’
एनसीपीसीआर की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि वे बेसहारा बच्चों की पहचान करने के लिए विधि कॉलेजों से मदद लेने पर विचार कर रहे हैं।
शीर्ष अदालत ने पूर्व में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कोविड-19 महामारी के कारण अनाथ हुए बच्चों और उनके परिवार के सदस्यों को विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने कोविड-19 के कारण अभिभावकों के गुजर जाने से बेसहारा हुए बच्चों के मामले का स्वत: संज्ञान लिया था।
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