विदेश की खबरें | स्क्रीन टाइम छोटे बच्चों को फायदा या नुकसान पहुंचा सकता है - सबकुछ कंटेंट पर निर्भर करता है
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. होयो दे मंजानारेस (स्पेन), 26 जून (द कन्वरसेशन) आज लोग अपना ज्यादातर वक्त स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, टैबलेट, टेलीविजन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे डिजीटल स्क्रीन पर बिताते हैं और इस पर दुनियाभर में विशेषज्ञों तथा माता-पिता के बीच बहस छिड़ी हुई है कि क्या छोटे बच्चों को इन डिजीटल उपकरणों का इस्तेमाल करने देना चाहिए।
होयो दे मंजानारेस (स्पेन), 26 जून (द कन्वरसेशन) आज लोग अपना ज्यादातर वक्त स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, टैबलेट, टेलीविजन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे डिजीटल स्क्रीन पर बिताते हैं और इस पर दुनियाभर में विशेषज्ञों तथा माता-पिता के बीच बहस छिड़ी हुई है कि क्या छोटे बच्चों को इन डिजीटल उपकरणों का इस्तेमाल करने देना चाहिए।
तो फिर ‘स्क्रीन टाइम’ का बच्चे के तंत्रिका-मनोवैज्ञानिक विकास पर वास्तविक प्रभाव क्या है?
कई बाल चिकित्सा संघ बचपन में खासतौर से पांच साल की आयु तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित रखने की सलाह देते हैं लेकिन अनुसंधान से पता चलता है कि यह तस्वीर पूरी तरह से सच नहीं है। बच्चे स्क्रीन टाइम में क्या देखते हैं, वह इसके प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण है।
शारीरिक प्रभाव :
कई अध्ययनों में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि स्क्रीन के लंबे समय तक उपयोग से बच्चों में आंखों की थकान, आंखों में सूखापन और निकट दृष्टि दोष हो सकता है।
इसके अलावा, बच्चों को जिस प्राकृतिक उत्तेजना की ज़रूरत होती है, तकनीक उसकी जगह नहीं ले सकती और न ही लेनी चाहिए। ‘फ्री प्ले’, शारीरिक व्यायाम, आमने-सामने बातचीत और प्रकृति के साथ संपर्क सभी बच्चे के विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन इनके स्थान पर स्क्रीन टाइम से मोटापे, दृष्टि दोष और सीखने की कठिनाइयों का जोखिम बढ़ सकता है।
तंत्रिका-मनोवैज्ञानिक प्रभाव :
शारीरिक प्रभाव के अलावा स्क्रीन टाइम के कारण ध्यान, सीखने और भावनात्मक विनियमन जैसे कार्यों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में चिंता है। तीन वर्ष से कम आयु के बच्चों पर किए गए 102 अध्ययनों की समीक्षा से पता चलता है कि स्क्रीन टाइम के घंटे ही एकमात्र कारक नहीं है, परिस्थितियाँ और संदर्भ भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
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