जयपुर, पांच जून राजस्थान के केन्द्रीय विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में दावा किया गया है कि अवैध खनन, भूमि अतिक्रमण और शहरीकरण के चलते गायब हुई अरावली पर्वतमाला की पहाड़ियों के कारण राजस्थान में पहले के मुकाबले रेतीली आंधियों की संख्या बढ़ी है।
केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष एल. के. शर्मा और पीएचडी स्कॉलर आलोक राज द्वारा किए गए अध्ययन का शीर्षक ‘एकीकृत भू-स्थानिक और कार्ट दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए अरावली रेंज (भारत) की भूमि-उपयोग गतिशीलता का आकलन’ है। यह अध्ययन हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'अर्थ साइंस इंफॉर्मेटिक्स' में प्रकाशित हुआ था।
प्रोफेसर शर्मा ने बताया, ‘‘पहाड़ियों का गायब होना, राज्य में बढ़ते आंधी-तूफान के पीछे के कारणों में से एक है। सबूत बताते हैं कि भरतपुर, धौलपुर, जयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसी जगहों को लुप्त हो रही पहाड़ियों के कारण सामान्य से अधिक आंधी-तूफान का सामना करना पड़ रहा है।’’
गौरतलब है कि इस साल अप्रैल और मई में, इनमें से कई इलाके आंधी-तूफ़ान और मूसलाधार बारिश की चपेट में आएथे, जिसके कारण कई लोगों की जान चली गई थी।
अध्ययन के अनुसार, पिछले दो दशकों में ऊपरी अरावली रेंज (हरियाणा-उत्तरी राजस्थान) में कम से कम 31 पहाड़ियाँ गायब हो गई हैं। इसके अलावा अरावली पहाड़ियों की निचली और मध्य सीमा में कई अन्य पहाड़ियां गायब हो गई हैं। 1975 से 2019 तक (44 साल) की अवधि के लिए किए गए अध्ययन में, यह पाया गया है कि वन क्षेत्र, बस्ती क्षेत्रों में बदल गए, जो पहाड़ियों के गायब होने के प्रमुख कारणों में से एक है।
अध्ययन के अनुसार, 1975 से 2019 तक की अवधि के अध्ययन के परिणामों से पता चला है कि अरावली में 3,676 वर्ग किलोमीटर भूमि बंजर हो गई और 776.8 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बसावट में परिवर्तित हो गया। 5,772.7 वर्ग किलोमीटर (7.63 प्रतिशत) वन भूमि में कमी आई है। 2059 तक, कुल 16,360.8 वर्ग किमी (21.64 प्रतिशत) वन भूमि के बस्ती (बसावट वर्ग) में परिवर्तित होने का अनुमान है।
शर्मा ने कहा, ‘‘मानवीय जरूरतों की पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग ने पर्यावरण को बहुत खराब कर दिया है। कमजोर कानूनी प्रक्रिया और अवैध खनन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण शेष पहाड़ियां बहुत जल्द गायब हो जाएंगी।’’ उन्होंने कहा कि अनियंत्रित खनन और शहरीकरण के कारण पिछले 20 वर्षों में अरावली पर्वतमाला की कई पहाड़ियां गायब हो गई हैं, जिससे दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पवर्तमाला की वनस्पतियों और जीवों के लिए खतरा पैदा हो गया है।
अध्ययन में कहा गया है कि इसने मानव-पशु संघर्ष को भी बढ़ाया है जहां तेंदुए, हिरण और चिंकारा भोजन के लिए मानव बस्तियों में प्रवेश करते हैं। अध्ययन में बताया गया है कि नील, चोना कुरिंजी और करुण कुरिंजी जैसे दुर्लभ पौधों पर भी लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। ऊपरी स्तर पर पहाड़ियों का गायब होना नरैना, कालवाड़, कोटपुतली, झालाना और सरिस्का में समुद्र तल से 200 मीटर से 600 मीटर की ऊँचाई पर दर्ज किया गया था।
शर्मा ने बताया, ‘‘1999 तक, 10,462 वर्ग किमी की सीमा शुष्क पर्णपाती वन से आच्छादित थी जो 2019 में घटकर 6116 वर्ग किमी (41 प्रतिशत) रह गई।’’ रिपोर्ट में 2018 के बाद से हर साल राज्य में धूल भरी आंधी का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जिसने कई लोगों की जान ले ली और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया।
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली से गुजरात तक - पूरी रेंज में मार्बल डंपिंग यार्ड को भी लाल झंडी दिखा दी गई है। यह सुझाव देता है कि राजस्थान द्वारा प्रदान किए गए खनन पट्टों, जो कि रेंज का 80 प्रतिशत - गुजरात (10 प्रतिशत), हरियाणा (7 प्रतिशत) और दिल्ली (3 प्रतिशत) का गठन करते हैं, की समीक्षा की जानी चाहिए और कमजोर क्षेत्रों में निलंबित कर दिया जाना चाहिए।
अध्ययन से पता चलता है कि अन्य आवश्यक निर्णायक रणनीतियों को अपनाया जाना चाहिए, जिसमें मानव हस्तक्षेप को सीमित करने के लिए अरावली रेंज के भीतर लागू किए जाने वाले प्रभावी विधायी और नियामक उपाय शामिल हैं। यह कहा गया है कि सीमा के भीतर अवैध खनन और भूमि अतिक्रमण को कम करने के लिए उपाय किए जाने चाहिए और लगातार क्षेत्र की निगरानी, वन की रोकथाम और समाशोधन भी किया जाना चाहिए।
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