देश की खबरें | आरोपी को दोषी मानने के लिये मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकती पुलिस: अदालत
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि पुलिस या कोई भी अन्य एजेंसी जनता की यह राय कायम करने के लिये मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकती कि आरोपी ही कथित अपराध का गुनहगार है वह भी तब जब मामले में जांच जारी हो क्योंकि इसमें मासूमियत के अनुमान को रद्द करने की क्षमता है।
नयी दिल्ली, 27 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि पुलिस या कोई भी अन्य एजेंसी जनता की यह राय कायम करने के लिये मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकती कि आरोपी ही कथित अपराध का गुनहगार है वह भी तब जब मामले में जांच जारी हो क्योंकि इसमें मासूमियत के अनुमान को रद्द करने की क्षमता है।
उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी जेएनयू छात्रा और पिंजरा तोड़ कार्यकर्ता देवांगना कलिथा की याचिका पर की जिसमें उसने पुलिस द्वारा अपने खिलाफ कुछ साक्ष्यों को चयनात्मक तरीके से लीक करने का आरोप लगाया है। अदालत ने कहा कि सांप्रदायिक दंगों से संबंधित मामला “निसंदेह संवेदनशील” है।
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने कलिथा के खिलाफ लगे आरोपों पर पुलिस को मामले में मुकदमा शुरू होने से पहले तक किसी तरह की सूचना प्रसारित करने से सोमवार को रोका। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में दर्ज की गई एफआईआर का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया जाता है, वह “यह उचित मानती है कि प्रतिवादी (दिल्ली पुलिस) को यह निर्देश दिया जाए कि वह किसी आरोपी या गवाह को लेकर तब तक कोई और संवाद न जारी करे जब तक कि आरोप, अगर कोई हों, तय नहीं कर लिये जाते और मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं होती।”
पिछले साल दिसंबर में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में, 23 मई को गिरफ्तार की गई कलिथा तिहाड़ जेल में बंद है।
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उसके खिलाफ कुल चार मामले दर्ज हैं जिसमें उत्तरपूर्वी दिल्ली में इस साल हुए दंगों से जुड़ा मामला भी है।
कलिथा की याचिका पर पारित 33 पन्नों के अपने फैसले में न्यायमूर्ति विभु बाखरु ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई खुली अदालत में करने की जरूरत है जबतक कि इसके विपरीत कोई निर्देश नहीं दिया जाता और कहा कि फिलहाल अदालत नहीं मानती की मुकदमे की सुनवाई के चरण में पुलिस को बयान जारी करने से रोकना उपयुक्त है।
अदालत यह भी मानती है कि किसी कथित अपराध के आरोपी के दोषी होने को लेकर लोगों की राय बनाने के उद्देश्य से सूचनाओं को चुनिंदा तरीके से उजागर करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए आदेश सुनाते हुए न्यायमूर्ति बाखरु ने यह भी कहा कि हालांकि मामले को लेकर दो जून को दिल्ली पुलिस द्वारा मीडिया को जारी प्रेस नोट को खारिज करने की कलिथा की याचिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पिंजरा तोड़ दिल्ली के विभिन्न कॉलेज की छात्राओं और पूर्व छात्रों का संगठन है।
नागरिकता कानून के समर्थकों एवं विरोधियों के बीच हिंसा अनियंत्रित हो जाने के चलते उत्तरपूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी को सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे । इन दंगों में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी और करीब 200 लोग घायल हो गए थे।
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