जरुरी जानकारी | वित्तवर्ष 2021 में बासमती चावल कंपनियों का परिचालन मुनाफा बढ़ेगा: क्रिसिल

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. कोविड ​​-19 महामारी और वैश्विक मंदी से कई उद्योगों के प्रभावित होने के बावजूद, वित्तवर्ष 2020-21 में बासमती चावल कंपनियों का परिचालन मुनाफा एक से डेढ़ प्रतिशत बढ़ना तय है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वृद्धि का कारण, धान की कीमतें कम होना और विदेशों में स्थिर मात्रा की मांग का होना है।

मुंबई, 28 जुलाई कोविड ​​-19 महामारी और वैश्विक मंदी से कई उद्योगों के प्रभावित होने के बावजूद, वित्तवर्ष 2020-21 में बासमती चावल कंपनियों का परिचालन मुनाफा एक से डेढ़ प्रतिशत बढ़ना तय है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वृद्धि का कारण, धान की कीमतें कम होना और विदेशों में स्थिर मात्रा की मांग का होना है।

क्रिसिल ने एक रिपोर्ट में कहा कि अच्छे मानसून और खेती के रकबा के स्थिर होने के कारण धान की कीमतें चालू वित्त वर्ष में 36 रुपये प्रति किलोग्राम के औसत मूल्य से लगभग 17 प्रतिशत घटने की उम्मीद है।

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क्रिसिल ने कहा कि चालू वित्तवर्ष में बासमती चावल कंपनियों का परिचालन मुनाफा में एक से डेढ़ प्रतिशत बढ़ना तय है क्योंकि धान की कीमतें कम हैं और विदेशों में मांग की मात्रा में स्थिरता है। इस परिस्थिति के कारण यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के उन खंडों में आ जाता है जो वैश्विक मंदी और कोविड-19 महामारी दोनों के प्रभावों से मुक्त होकर अच्छा प्रदर्शन करने जा रहा है।

ईरान को छोड़कर अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिम एशिया जैसे प्रमुख बाजारों से मांग, भारत के बासमती चावल के कुल निर्यात के आधे से भी अधिक की है। वहां लगभग 44 लाख टन का बासमती चावल का निर्यात होता है। इन देशों में मजबूत मांग बनी हुई है।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों में मांग में वृद्धि का मुख्य कारण है कि ये देश कोविड-19 महामारी के बीच खाद्य सुरक्षा के लिहाज से अपने ‘बफर स्टॉक’ का निर्माण कर रहे है।

ईरान, जो लगभग 13 लाख टन सालाना का आयात करता है। उसके खिलाफ अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण पिछले वित्त वर्ष से भुगतान संबंधी कुछ मुद्दों की वजह से इस बार भारत से आयात की मात्रा में 20 प्रतिशत की कमी हो सकती है।

हालांकि, क्रिसिल का कहना है कि अन्य विदेशी बाजारों से अधिक मांग होने के कारण उक्त कमी की भरपाई हो जाने की उम्मीद है।

घरेलू बाजार में सालाना 20 लाख टन की बिक्री होती है। खुदरा मांग के कारण घरेलू बाजार से 52 रुपये प्रति किलो के भाव में स्थिरता देखी जा सकती है।

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