नयी दिल्ली, 22 जुलाई कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने शुक्रवार को कहा कि जैविक और प्राकृतिक खेती से उगाई जाने वाली फसलों में अंतर करने के लिए एक सरल, सस्ती और आसानी से अपनाने वाली प्रमाणन प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है।
तोमर ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि हालांकि जैविक और प्राकृतिक दोनों तरह की खेती, गैर-रासायनिक खेती है, लेकिन उनके लिए विशिष्ट प्रमाणन प्रणाली अपनाने की जरूरत है।
दोनों बड़े पैमाने पर विविधता, ‘ऑन-फार्म बायोमास’ प्रबंधन, प्राकृतिक पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण के कायाकल्प, फसल चक्रण, बहु फसल और कुशल संसाधनों के पुनर्चक्रण पर निर्भर हैं।
तोमर ने सदन को बताया कि सरकार पारंपरिक स्वदेशी प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2020-21 से परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) यानी प्राकृतिक खेती को लागू कर रही है।
यह योजना मुख्य रूप से सभी कृत्रिम रासायनिक पदाथों के बहिष्कार पर जोर देती है।
उन्होंने कहा कि बीपीकेपी के तहत ‘क्लस्टर’ निर्माण, क्षमता निर्माण और प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा निरंतर सहायता, प्रमाणीकरण और अवशेष विश्लेषण की खातिर 3 साल के लिए प्रति हेक्टेयर 12,200 रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
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