नयी दिल्ली, आठ मार्च उच्चतम न्यायालय ने एक सार्वजनिक भर्ती परीक्षा की शुचिता से समझौता करने के आरोपी दो व्यक्तियों को जमानत देने के एक आदेश को रद्द करते हुए कहा कि इससे संभवतः कई अन्य लोग प्रभावित हुए हैं, जिन्होंने नौकरी पाने की उम्मीद में ईमानदारी से प्रयास किया था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने कहा कि इस तरह के कृत्य लोक प्रशासन और कार्यपालिका पर जनविश्वास में संभावित कमी के द्योतक हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘ भारत में, वास्तविकता यह है कि सरकारी नौकरियों के इच्छुक लोगों की संख्या उपलब्ध नौकरियों से कहीं ज़्यादा है। जैसा कि हो सकता है, प्रत्येक नौकरी में प्रवेश की एक स्पष्ट प्रक्रिया होती है, जिसमें निर्धारित परीक्षा और साक्षात्कार से गुजरना होता है, उसे केवल उसी के अनुसार भरा जाना होता है।’’
शीर्ष अदालत ने कहा है कि भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण ईमानदारी से जनता में इस बात का विश्वास पैदा होता है कि जो लोग इन पदों के वास्तविक हकदार हैं, उन्हें ही इन पदों पर नियुक्त किया गया है।
उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के पिछले वर्ष मई के आदेश को चुनौती देते हुए राज्य सरकार द्वारा दायर की गयी अपील पर अपना फैसला सुनाया।
उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और राजस्थान सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2022 के प्रावधानों के तहत कथित अपराधों के लिए दर्ज प्राथमिकी के संबंध में दोनों आरोपियों को जमानत दी थी।
प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने सहायक अभियंता सिविल (स्वायत्त शासन विभाग) प्रतियोगी परीक्षा-2022 की शुचिता से समझौता किया है।
प्राथमिकी में दावा किया गया है कि उनमें से एक की जगह एक अन्य व्यक्ति कथित तौर पर ‘डमी उम्मीदवार’ के रूप में परीक्षा में उपस्थित हुआ था। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि उपस्थिति पत्रक के साथ छेड़छाड़ की गई थी और मूल प्रवेश पत्र पर किसी दूसरे व्यक्ति की तस्वीर चिपका दी गई थी।
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