जरुरी जानकारी | खाद्य तेल-तिलहन कीमतों में मिला-जुला रुख

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नयी दिल्ली, तीन फरवरी सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के रिकॉर्ड आयात के बीच दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में शुक्रवार को कारोबार का मिला-जुला रुख दिखाई दिया, जबकि अधिकांश तेल-तिलहनों के दाम पूर्वस्तर पर बंद हुए।

बाजार के जानकार सूत्रों ने कहा कि सूरजमुखी की देश में बुवाई होने वाली है और बंदरगाहों पर काफी अधिक मात्रा में सूरजमुखी और सोयाबीन तेल का आयात हो चुका है। इन तेलों के दाम इतने टूटे हुए हैं कि इससे देश में सूरजमुखी की बुवाई प्रभावित हो सकती है। मंडियों में सूरजमुखी बीज न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे बिक रहा है लेकिन खुदरा बाजार में सूरजमुखी तेल का भाव सोयाबीन से 30-40 रुपये लीटर अधिक है। स्थिति को काबू में लाने का एक ही उपाय दिखता है कि इन दो आयातित तेलों पर अधिकतम सीमा तक आयात शुल्क लगाया जाये। शुल्क लगाने से यदि इन दो तेलों के दाम मामूली बढ़ते भी हैं, तो इन तेलों की खपत करने वाले उच्च आयवर्ग पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होना चाहिये। लेकिन ऐसा करने से हमारे देशी तेल बाजार में खप जायेंगे और हमें पशुआहार और मुर्गीदाने के लिए खल और डी-आयल्ड केक (डीओसी) पर्याप्त मात्रा में मिल जायेगा जिसकी उपलब्धता से दूध और अंडों के दाम कम होंगे।

तिलहन खल और डीओसी की कमी के बीच इनके दाम महंगा होने से पिछले कुछ दिनों में दूध, दुग्ध उत्पाद, अंडे, चिकन आदि के दाम पर्याप्त रूप से बढ़े हैं।

सूत्रों ने कहा कि सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के भारी आयात के बीच सोयाबीन तेल के दाम में गिरावट आई। जबकि मलेशिया एक्सचेंज में मामूली सुधार के कारण कच्चे पामतेल (सीपीओ) और पामोलीन तेल के दाम में सुधार आया। बाकी अधिकांश तेल-तिलहन अपरिवर्तित बने रहे। इन तेलों के भाव अपरिवर्तित हैं पर इनका उठाव बिल्कुल कम है।

सूत्रों ने कहा कि आज से लगभग 29 साल पहले देश में सूरजमुखी की खेती 26 लाख 78 हजार हेक्टेयर में होती थी और इस खेती में अधिकांश योगदान कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश का था। लेकिन मौजूदा समय में देश में मात्र लगभग तीन लाख हेक्टेयर में इस फसल की खेती की जाती है। इसमें से कर्नाटक में पहले 14 लाख हेक्टेयर में सूरजमुखी खेती होती थी जो मौजूदा समय में घटकर 1.20 लाख हेक्टेयर ही रह गया है।

शुल्कमुक्त आयात की कोटा व्यवस्था से न तो सरकार को, न तेल उद्योग को, न किसानों को न ही उपभोक्ताओं को कोई फायदा मिलता दिख रहा है। उल्टे इसके प्रतिकूल नतीजे सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ी दिक्कत तो सरसों जैसे देशी तेल के खपने की हो रही है जिससे आगे तिलहन बिजाई का काम प्रभावित होने का खतरा है। खाद्य तेलों के दाम धराशायी होने के बावजूद खुदरा बिक्री करने वाली तेल कंपनियां बढ़ाचढ़ा-कर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) छापकर उपभोक्ताओं को तेल कीमतों की गिरावट के लाभ से वंचित कर रही हैं। सरकार को तेल उत्पादक कंपनियों को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बारे में सरकारी पोर्टल पर नियमित आधार पर जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य कर देना चाहिये तो समस्या खुद-ब-खुद सुलझने लगेगी। सूत्रों ने कहा कि इस कोटा व्यवस्था को तत्काल समाप्त करना जरूरी है।

शुक्रवार को तेल-तिलहनों के भाव इस प्रकार रहे:

सरसों तिलहन - 6,040-6,090 (42 प्रतिशत कंडीशन का भाव) रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली - 6,450-6,510 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली तेल मिल डिलिवरी (गुजरात) - 15,425 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली रिफाइंड तेल 2,420-2,685 रुपये प्रति टिन।

सरसों तेल दादरी- 12,550 रुपये प्रति क्विंटल।

सरसों पक्की घानी- 2,010-2,040 रुपये प्रति टिन।

सरसों कच्ची घानी- 1,970-2,095 रुपये प्रति टिन।

तिल तेल मिल डिलिवरी - 18,900-21,000 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल मिल डिलिवरी दिल्ली- 12,400 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन मिल डिलिवरी इंदौर- 12,200 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल डीगम, कांडला- 10,550 रुपये प्रति क्विंटल।

सीपीओ एक्स-कांडला- 8,350 रुपये प्रति क्विंटल।

बिनौला मिल डिलिवरी (हरियाणा)- 10,800 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन आरबीडी, दिल्ली- 10,000 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन एक्स- कांडला- 9,050 रुपये (बिना जीएसटी के) प्रति क्विंटल।

सोयाबीन दाना - 5,420-5,500 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन लूज- 5,160-5,180 रुपये प्रति क्विंटल।

मक्का खल (सरिस्का)- 4,010 रुपये प्रति क्विंटल।

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