देश की खबरें | मनोज जारांगे: मराठा आरक्षण की मांग को लेकर सरकार के सामने ताल ठोकने वाले कार्यकर्ता

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औरंगाबाद, पांच सितंबर मराठा आरक्षण की मांग को लेकर ताजा विरोध प्रदर्शन का चेहरा बने किसान परिवार से आने वाले मनोज जारांगे ने महाराष्ट्र के किसानों और अपने समुदाय से संबंधित मुद्दों को उठाने से पहले राजनीति में हाथ आजमाया था।

जारांगे ने जब 29 अगस्त को निकटवर्ती जालना जिले के एक गांव में मराठा आरक्षण के समर्थन में अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी, तब इस पर किसी का खास ध्यान नहीं गया था, लेकिन एक सितंबर को उस समय सब कुछ बदल गया जब स्थानीय अधिकारियों द्वारा उन्हें अस्पताल ले जाने की कोशिश करने के कारण हिंसा भड़क गई।

इसके बाद हुए घटनाक्रम ने 14 महीने पुरानी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली तीन दलों की सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी।

विपक्ष ने जारांगे और मराठा आरक्षण की मांग के समर्थकों पर पुलिस कार्रवाई के लिए उपमुख्यमंत्री एवं राज्य के गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस के इस्तीफे की मांग की।

पिछले शुक्रवार को जालना जिले के अंतरवाली सारथी गांव में प्रदर्शनकारियों ने अधिकारियों को जारांगे को अस्पताल ले जाने से रोक दिया, जिसके बाद हिंसक भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े।

हिंसा में 40 पुलिस कर्मियों सहित कई लोग घायल हो गए और 15 से अधिक राज्य परिवहन बसों में आग लगा दी गई।

विरोध प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई के चलते लगभग 40 वर्ष के दुबले-पतले कार्यकर्ता जारांगे चर्चा में आए और शिवसेना-भाजपा-राकांपा (अजित पवार समूह) सरकार को एक बार फिर शिक्षा व नौकरियों में मराठों के लिए आरक्षण के बारे में बात शुरू करनी पड़ी। मराठा आरक्षण एक भावनात्मक मुद्दा है, जो कानूनी विवाद में उलझा हुआ है।

जारांगे मूल रूप से मध्य महाराष्ट्र के बीड जिले के एक छोटे से गांव मटोरी के रहने वाले हैं और उन्हें जानने वाले लोगों के अनुसार, उन्होंने किसानों और मराठा समुदाय के लिए आंदोलन करने से पहले दलगत राजनीति में कुछ समय बिताया था।

मटोरी में रहने वाले पत्रकार राजेंद्र काले ने ‘पीटीआई-’ को बताया कि जारांगे ने अपनी स्कूली शिक्षा गांव में ही पूरी की। मटोरी में कुछ साल बिताने के बाद, वह जालना जिले के अंबाद तहसील के अंतर्गत शाहगढ़ चले गए, जहां उन्होंने एक होटल में काम किया।

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