देश की खबरें | मणिपुर जातीय हिंसा: केंद्रीय बलों की और तैनाती चाहते हैं ग्रामीण

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(ऋषिकेश कुमार)

चुराचांदपुर/विष्णुपुर, 19 जुलाई मेइती और कुकी समुदाय के बीच जातीय हिंसा से जूझ रहे मणिपुर के गांवों में कई अन्य समुदाय भी संघर्ष के खतरों का सामना कर रहे हैं और उनका हर दिन भय तथा अनिश्चितता के बीच गुजर रहा है।

फूलजंग और फाओगाकचाओ गांवों के बीच क्वातका नगर परिषद के वार्ड संख्या नौ में निवासियों के चेहरे पर खौफ स्पष्ट नजर आता है क्योंकि उन्हें अघोषित गोलीबारी और स्थानीय अधिकारियों के कथित “बेपरवाह रवैये” का सामना करना पड़ रहा है।

छोटी-छोटी झोपड़ियों से घिरी इस बस्ती में, दीवारों और छतों पर हिंसा के ताजा निशान हैं, जिन पर लगातार होने वाली गोलीबारी के दौरान गोलियों से अनगिनत चोटें आई हैं।

झोपड़ी के अंदर पड़े फर्नीचर और रसोई के बर्तन अनगिनत छेदों वाले हैं, जिनमें से हर छेद, घर की कमजोर दीवारों को पार कर आई एक गोली लगने की पीड़ा बताता है।

फाओगाकचाओ के ग्रामीणों की तरफ से वाहिद रहमान उस गंभीर स्थिति का वर्णन करते हैं जिसमें वे खुद को घिरा पाते हैं।

उन्होंने कहा, “हम हाशिये पर रह रहे हैं, भविष्य के बारे में कोई निश्चितता नहीं है। गोलीबारी अचानक शुरू होती है, और घंटों तक चल सकती है। हमने अपने कुछ साथी ग्रामीणों को स्थिति से बचने के लिए पास के रिश्तेदारों के पास भागते देखा है, लेकिन हम जैसे लोग जिनके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है, हम उन खतरों के खौफ़ के साथ जीने के लिए मजबूर हैं जिनका हम सामना कर रहे हैं।”

घर से कुछ दूर पर ही हिंसा का सामना कर रहे फूलजंग के कुछ निवासियों का कहना है कि वे महसूस करते हैं कि स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें छोड़ दिया है।

इफाफ मयूम वाई. खान के शब्द फूलजंग के उनके साथी ग्रामीणों के साथ गूंजते हैं।

मयूम ने अपने गांव में ‘पीटीआई-’ को बताया, “इस जगह से महज 2-3 किलोमीटर दूर, मई में मेइती और कुकी समुदायों के बीच झड़पें शुरू हुईं। तब से, हमारी शांति नष्ट हो गई है। हमारे जीवन का दर्द समझने वाला कोई नहीं आया, न तो स्थानीय विधायक और न ही कोई सरकारी अधिकारी।”

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