विदेश की खबरें | हिंसक देशों में युवाओं की जीवन प्रत्याशा 14 साल कम: अध्ययन

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लंदन, छह फरवरी हिंसक देशों में युवाओं की जीवन प्रत्याशा शांतिपूर्ण देशों की तुलना में 14 साल तक कम हो सकती है। एक वैश्विक अध्ययन रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

ब्रिटेन स्थित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के नेतृत्व वाली टीम ने दिखाया कि हिंसक समाज में जीवन की अनिश्चितता का छोटे जीवन और कम अनुमानित जीवन के ‘दोहरे बोझ’ से सीधा संबंध है, इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जो हिंसा में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हैं।

जर्नल ‘साइंस एडवांसेस’ में प्रकाशित इस अध्ययन रिपोर्ट में सबसे कम और सर्वाधिक हिंसक देशों के 10 साल की उम्र वाले बच्चों की जीवन प्रत्याशा (व्यक्ति के जितने साल तक जीने की उम्मीद की जाती है) में 14 साल के अंतराल का अनुमान लगाया गया है।

अल सल्वाडोर, होंडुरास, ग्वाटेमाला और कोलंबिया में अधिक आय वाले देशों के मुकाबले जीवन प्रत्याश में अंतर को प्रमुख रूप से हत्याओं के कारण अधिक मृत्यु दर के जरिये स्पष्ट किया गया है।

ऑक्सफोर्ड के लीवरहल्मे सेंटर फॉर डेमोग्राफिक साइंस के जोस मैनुएल अबुर्तो ने कहा, ‘‘हमने पाया कि आजीवन अनिश्चितता का जीवन प्रत्याशा की तुलना में हिंसा से अधिक संबंध है।’’

अध्ययन के प्रमुख लेखक अबुर्तो ने कहा कि मृत्यु दर की रुझान में बदलाव का विश्लेषण करते समय आजीवन अनिश्चितता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

वर्ष 2008-2017 के बीच के आंतरिक शांति सूचकांक और 162 देशों से मृत्यु दर डेटा का उपयोग करके अध्ययन रिपोर्ट में दिखाया गया है कि सबसे हिंसक देश वे हैं, जहां आजीवन रहने वाली अनिश्चितता सबसे अधिक है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि पश्चिम एशिया में कम उम्र में संघर्ष से संबंधित मौतों का इसमें सबसे बड़ा योगदान है, जबकि लैटिन अमेरिका में हत्या और पारस्परिक हिंसा के कारण इस तरह का रुझान दिखता है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2008 और 2017 के बीच आजीवन अनिश्चितता ज्यादातर उत्तरी और दक्षिणी यूरोपीय देशों में स्पष्ट रूप से काफी कम थी।

शोधकर्ताओं ने पाया कि उच्च आय वाले देशों में कैंसर संबंधी मृत्यु दर में गिरावट आजीवन अनिश्चितता को कम करने में मददगार है।

रिपोर्ट में कहा गया कि सर्वाधिक हिंसक समाजों में आजीवन अनिश्चितता का अनुभव वे लोग भी करते हैं, जो हिंसा में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हैं।

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