देश की खबरें | कोविड-19: दिल्ली की पहली महिला प्लाज्मा दाता ने की महिलाओं से आगे आने की अपील
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. राष्ट्रीय राजधानी में प्लाज्मा दान करने वाली पहली युवती ने रविवार को और महिलाओं से प्लाज्मा दान करने तथा कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में योगदान देने को कहा।
नयी दिल्ली, पांच जुलाई राष्ट्रीय राजधानी में प्लाज्मा दान करने वाली पहली युवती ने रविवार को और महिलाओं से प्लाज्मा दान करने तथा कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में योगदान देने को कहा।
उत्तर पश्चिम दिल्ली के रोहिणी की निवासी और पत्रकारिता की छात्रा भूमिका कोहली (20) को 30 मई को कोरोना वायरस संक्रमण की पुष्टि हुई थी। उसके भाई अर्पित कोहली को 25 मई को संक्रमण का पता चला था।
दोनों भाई-बहन ने शनिवार को यहां यकृत और पित्त विज्ञान संस्थान (आईएलबीएस) में देश के पहले प्लाज्मा बैंक में अपना प्लाज्मा दान किया।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बृहस्पतिवार को इस केंद्र का उद्घाटन किया था। इसका उद्देश्य कोरोना वायरस रोगियों के उपचार के लिए बतौर परीक्षण इस्तेमाल किये जा रहे प्लाज्मा की सुगम उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
इस प्लाज्मा बैंक ने कोविड-19 से स्वस्थ हुए लोगों के साथ संपर्क किया है जो प्लाज्मा दे सकते हैं।
भूमिका ने कहा कि आप विधायक राघव चड्ढा ने उसे और उसके भाई को प्लाज्मा दान के लिए प्रेरित किया।
अर्पित ने कहा, ‘‘हमें घर से ले जाने और छोड़ने की सुविधा दी गयी। कोई परेशानी नहीं हुई। कुछ जांच कर पता लगाया गया कि हम प्लाज्मा दान कर सकते हैं या नहीं। पूरी प्रक्रिया में केवल 45 मिनट लगे।’’
भूमिका को यह जानकर खुशी हुई कि वह दिल्ली में प्लाज्मा दान करने वाली पहली महिला है।
उसने कहा, ‘‘डॉक्टरों ने मुझे प्रशस्ति पत्र दिया और अन्य लोगों को प्रेरित करने के लिए मेरा वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया।’’
भूमिका के मुताबिक, ‘‘कई महिलाएं इस तरह की कवायद में शामिल होने से हिचकती हैं। इसमें चिंता की कोई बात नहीं है और इसमें कोई कलंक की बात भी नहीं है। उन्हें महामारी से लड़ रहे अधिकारियों की मदद के लिए आगे आना चाहिए।’’
भूमिका ने अपनी दोस्त सृष्टि को भी प्लाज्मा दान के लिए प्रेरित किया जो कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद ठीक हो चुकी है।
उसने कहा कि इस महामारी से संक्रमित लोगों को मजबूत रहना चाहिए और लोगों तथा परिवार से संपर्क में रहना चाहिए। यह बीमारी शरीर से ज्यादा दिमाग को प्रभावित करती है।
भूमिका ने कहा, ‘‘14 दिन का पृथक-वास भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे समय में उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।’’
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